Wednesday, June 3, 2026

इतिहास के झरोखे से: जानिए वर्ष 1872 की जनगणना में रुहेलखंड और मध्य दोआब के राजपूत राजवंशों की स्थिति।

 

Source- Statistical, Descriptive And Historical Account Of The North-Werstern Provinces Of INDIA. (Image courtesy of YSCRI)


मुख्य बातें (Highlights):

  • ब्रिटिश काल की पहली जनगणना (1872) के दुर्लभ ऐतिहासिक आंकड़े।

  • बदायूँ, फर्रूखाबाद और बरेली जनपदों में विभिन्न राजपूत शाखाओं की जनसांख्यिकी।

  • इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़।

विशेष लेख: भारतीय इतिहास में जनसांख्यिकी (Demography) का अध्ययन हमेशा से ही सामाजिक और राजनीतिक संरचना को समझने का एक मुख्य जरिया रहा है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1872 ई० में हुई देश की पहली आधिकारिक जनगणना एक ऐसा ही महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी। इस जनगणना ने न केवल आबादी के आंकड़े सामने रखे, बल्कि तत्कालीन उत्तर प्रदेश (तब के नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेज) के अलग-अलग जिलों में विभिन्न राजवंशों और कुलों की स्थिति को भी स्पष्ट किया।

आज हम इस लेख में 1872 की जनगणना के उन दुर्लभ आंकड़ों पर नज़र डालेंगे, जो हमारे तीन प्रमुख ऐतिहासिक जनपदों — बदायूँ, फर्रूखाबाद और बरेली में राजपूत (क्षत्रिय) राजवंशों की आबादी और उनकी शाखाओं को दर्शाते हैं।

1. जनपद बदायूँ: गौर और चौहान राजवंशों का दबदबा

वर्ष 1872 की जनगणना के अनुसार, बदायूँ जनपद में राजपूतों की कई शाखाएं निवास कर रही थीं, जिनमें गौर और चौहान वंश की जनसंख्या सबसे अधिक थी।

  • गौर: 6,976

  • चौहान: 6,813

  • बैस: 5,663

  • कठेरिया: 4,744

  • तोमर: 4,690

  • राठौर: 4,303

  • बडगूजर: 2,882

  • सोलंकी: 1,615

अन्य सम्मलित शाखाएं: मुख्य कुलों के अलावा सिकरवार, कठिया, गौतम, जंगोरी, पुंढीर, गहलोत, धाकरे, बच्छल, सोमवंशी, परमार, बघेल, भिटला, रघुवंशी, सावंत, भट्टी, कछवाहा, चंदेल, रैकवार, जांगरा, जादौन, गहरवार, भदौरिया और गौर कसमानी जैसी अन्य उप-शाखाओं की कुल सम्मिलित जनसंख्या 23,799 दर्ज की गई थी।

2. जनपद फर्रूखाबाद: राठौर और बैस राजवंशों की प्रधानता

गंगा के तट पर बसे ऐतिहासिक जनपद फर्रूखाबाद में राठौर और बैस राजवंशों की आबादी सबसे प्रमुख थी। 1872 के आंकड़े कुछ इस प्रकार थे:

  • राठौर: 8,883

  • बैस: 8,704

  • गौर: 5,982

  • सोमवंशी: 5,634

  • चौहान: 5,179

  • गहरवार: 4,148

  • परमार: 2,261

  • कठेरिया: 2,168

अन्य सम्मलित शाखाएं: फर्रूखाबाद में इनके अलावा भी राजपूत संस्कृति की एक बड़ी विविधता थी। यहाँ सम्मलित रूप से भल, भदौरिया, बच्छल, बघेल, चंदेल, गहलोत, कछवाहा, निकुंभ, परिहार, सेंगर, उज्जैनी, जांगडा, बडगूजर, सोलंकी, कमवार, गौतम, रघुवंशी, तमता, रैकवार, चमरगौर, गोरखिया, अजुधिवंशी, बुंदेला, भिमला, चन्द्रवंशी, सिकरवार, जैसवार, बमनगौर, बमटेला और बिसेन राजवंशों के लोग भी निवास कर रहे थे।

3. जनपद बरेली: चौहान और कठेरिया राजवंशों का गढ़

रुहेलखंड के केंद्र बरेली में चौहान और इस क्षेत्र के मूल ऐतिहासिक शासक माने जाने वाले कठेरिया राजपूतों की आबादी सबसे आगे थी।

  • चौहान: 9,950

  • कठेरिया: 8,652

  • जांगडा: 6,611

  • राठौर: 3,163

  • गौर: 2,730

  • सोमवंशी: 2,292

  • बैस: 1,358

  • गौतम: 824

अन्य सम्मलित शाखाएं: बरेली जनपद में भदौरिया, थापा, बडगूजर, बच्छल, कछवाहा, कठिया, सिकरवार, परमार, चंदेल, कश्यप, जादौन, निकुंभ, सेंगर, तोमर, सावंत, रैकवार, किनवार, रावत, गोहिल, सोलंकी, बुंदेला और गहलोत राजवंशों की कुल सम्मिलित जनसंख्या 3,542 थी।

ऐतिहासिक महत्व और निष्कर्ष

ये आंकड़े बताते हैं कि 19वीं सदी के उत्तरार्ध में रुहेलखंड और मध्य दोआब के इन तीन जिलों में राजपूतों की 30 से भी अधिक शाखाएं और उप-शाखाएं सक्रिय रूप से निवास कर रही थीं। बदायूँ में गौर, फर्रूखाबाद में राठौर और बरेली में चौहान वंश संख्या के मामले में अपनी-अपनी जगहों पर शीर्ष पर थे।

इतिहास के नजरिए से यह डेटा इस बात का गवाह है कि सदियों के उतार-चढ़ाव और राजनीतिक बदलावों के बावजूद इन क्षेत्रों में विभिन्न क्षत्रिय कुलों की सामाजिक उपस्थिति कितनी गहरी और विविधतापूर्ण रही है। आज के समय में ये आंकड़े समाजशास्त्रियों और क्षेत्रीय इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए एक अनमोल धरोहर हैं।

Research - Yogeshwar Shri Krishna Cultural Research Institute (YSCRI)

Source- Statistical, Descriptive And Historical Account Of The North-Werstern Provinces Of INDIA.

Tuesday, June 2, 2026

इतिहास के पन्नों से: जानिए 1872 की जनगणना में एटा, मैनपुरी और इटावा में क्या थी क्षत्रिय समाज की स्थिति?



Source: Statistical, Descriptive And Historical Account of North-Western Provinces of India, Year 1876 A.D., Courtesy of  YSCRI



ऐतिहासिक अभिलेखों के झरोखे से

 आज हम डिजिटल युग में जी रहे हैं, जहाँ आबादी के आँकड़े एक क्लिक पर मिल जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज से लगभग 150 साल पहले हमारे समाज और क्षेत्र की जनसांख्यिकी (Demographics) कैसी थी?


वर्ष 1876 ई० में ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रकाशित स्टेटिकल गजेटियर (Statistical, Descriptive And Historical Account of North-Western Provinces of India) में एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक डेटा मिलता है। यह डेटा वर्ष 1872 ई० में हुई भारत की पहली क्रमिक जनगणना पर आधारित है, जो उत्तर प्रदेश के 'लोअर दोआब' क्षेत्र के तीन प्रमुख जनपदों—एटा, मैनपुरी और इटावा में क्षत्रिय (राजपूत) समाज की विभिन्न शाखाओं और उनकी जनसंख्या की स्थिति को दर्शाता है।


आइए देखते हैं उस दौर में इन तीनों जनपदों में किस वंश के क्षत्रियों की कितनी आबादी थी:

1. जनपद एटा: चौहान और सोलंकी राजवंशों की प्रधानता


1872 की जनगणना के अनुसार, एटा जनपद में चौहान और सोलंकी क्षत्रियों की संख्या सबसे अधिक दर्ज की गई थी।


चौहान: 16,918

सोलंकी: 8,977

राठौर: 7,775

कटिया: 3,397

गौर: 3,162

गौरहर: 2,617

बैस: 2,259

पुंडीर: 1,890

तोमर: 1,789

बडगूजर: 1,398

जादौन: 868

गहलोत: 666


 2. जनपद मैनपुरी: चौहान राजवंश का विशाल गढ़


मैनपुरी हमेशा से ही चौहान राजवंश का एक मजबूत केंद्र रहा है। 1872 के आँकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं, जहाँ चौहानों की संख्या 26 हजार से अधिक थी।


चौहान:  26,854

किरार:  7,538

बैस:  4,415

राठौर:  2,598

गहरवार:  2,469

तोमर:  2,173 

धाकरे:  1,925

टांक:  1,596

भदौरिया:  1,400

1,000 से कम जनसंख्या वाले वंश:

 मैनपुरी जनपद में कई अन्य क्षत्रिय शाखाएँ भी निवास कर रही थीं, जिनकी आबादी 1,000 से कम थी। इनमें प्रमुख रूप से बडगूजर, बच्छल, बघेल, बांगर, भाले सुल्तान, चंदेल, चन्द्रवंशी, दीक्षित, डोर, गहलोत, गौतम, जैसवार, जांगरा, जदुवंशी, कठेरिया, कछवाहा, निकुंभ, निर्मल, परमार, परिहार, रघुवंशी, रैकवार, राणा, सिकरवार, सूर्यवंशी, सोलंकी, सोमवंशी, सेंगर और उजम शामिल थे।


 3. जनपद इटावा: सिकरवार और चौहानों का बाहुल्य


इटावा जनपद में क्षत्रिय समाज का एक बेहद विविध रूप देखने को मिलता है। यहाँ सिकरवार और चौहान राजवंशों की आबादी सबसे प्रमुख थी।


सिकरवार:  12,952

चौहान:  10,984

कछवाहा: 5,213

परिहार:  3,881

भदौरिया:  3,667

गौर:  2,766

सेंगर:  2,473

गहलोत:  1,724

बैस:  1,291

राठौर:  1,099

बमनगौर:  948


800 से कम जनसंख्या वाले वंश:

 इटावा में भी एक बहुत बड़ा वर्ग उन राजपूत वंशों का था जिनकी व्यक्तिगत आबादी 800 से कम थी। इस सूची में बडगूजर, बच्छल, बुंदेला, बांगर, चंदेल, छोंकर, चमरगौर, धाकरे, दीक्षित, गहरवार, गौतम, गोलम, जैसवार, जानवर, जादौन, जसावत, किनवार, कठेरिया, किरार, काठी, कटियार, निकुंभ, उज्जैनी, परमार, पुंडीर, परवार, पच्छी, रघुवंशी, रैकवार, सोमवंशी और तोमर जैसे गौरवशाली वंश शामिल थे।


 इतिहास में इस दस्तावेज़ का महत्व


ब्रिटिश सरकार द्वारा वर्ष 1876 ई० में जारी किया गया यह स्टेटिकल गजेटियर (Statistical, Descriptive And Historical Account of North-Western Provinces of India) आज के समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों के लिए एक अमूल्य धरोहर है। यह आँकड़े हमें बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के इस दोआब क्षेत्र (गंगा-यमुना के बीच का मैदान) के सामाजिक ताने-बाने को गढ़ने में क्षत्रिय समाज की विभिन्न शाखाओं का कितना बड़ा और व्यापक योगदान रहा है। 150 साल पुराने ये आँकड़े आज भी हमारे पूर्वजों की विरासत और क्षेत्रीय इतिहास को समझने का एक प्रामाणिक जरिया हैं।


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Research by -  Yogeshwar Shri Krishna Cultural Research Institute (YSCRI)

Soruce - Statistical, Descriptive And Historical Account of North-Western Provinces of India, Year 1876 A.D.