Sunday, May 31, 2026

प्रभु श्रीकृष्ण की क्रीड़ा स्थली 'कामवन' (कांमा) और उसका विस्मृत पुरातात्विक वैभव।


स्तंभ पर अंकित त्रिभंग मुद्रा में खड़े भगवान श्रीकृष्ण का विरूपित विग्रह, जो कामवन के प्राचीन गौरव और वैष्णव संस्कृति के चरमोत्कर्ष को दर्शाता है। (चित्र सौजन्य: YSCRI)


प्रस्तावना: ब्रजमंडल का ऐतिहासिक हृदय 'ब्रह्मपुर'

सनातन धर्म और संस्कृति में ब्रज चौरासी कोस का अत्यंत पावन और ऐतिहासिक महत्व है। इसी ब्रज क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली प्रभु श्रीकृष्ण की अनन्य क्रीड़ा स्थली है 'कामवन', जिसे आधुनिक समय में 'कांमा' के नाम से जाना जाता है। भौगोलिक दृष्टि से यह ऐतिहासिक स्थल वर्तमान में राजस्थान के नवगठित डीग जिले (पूर्व में भरतपुर जिला) के अंतर्गत आता है।

ऐतिहासिक और पौराणिक कालखंड में इस क्षेत्र को 'ब्रह्मपुर' के नाम से जाना जाता था। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान पूर्व राजपूताना के राजनीतिक एजेंट और अंग्रेज अधिकारी मेजर एच.ई. ड्रेक-ब्रॉकमैन (Major H.E. DRAKE BROCKMAN) द्वारा संकलित 'A Gazetteer of Eastern Rajputana Comprising the Native States of Bharatpur, Dholpur & Karauli' (1905) के अनुसार, कांमा ब्रज क्षेत्र में हिंदुओं का एक अत्यंत पवित्र स्थान है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रारंभिक जीवन (बाल्यकाल) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बिताया था। इस गजेटियर के अनुसार, प्रभु श्रीकृष्ण के  नाना  'कामसेन' के नाम  पर इस स्थान का नाम  'कांमा' पड़ा।

दूसरी ओर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के प्रथम महानिदेशक सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने वर्ष 1882-83 की अपनी पुरातात्विक रिपोर्ट 'A Tour in Eastern Rajputana' में एक अन्य मत प्रस्तुत किया है। कनिंघम के अनुसार, 'कांमा' नाम यहाँ बहुतायत में पाए जाने वाले पवित्र 'कदम्ब वन' का ही एक संकुचित रूप या अपभ्रंश है।

जादौन राजाओं का इतिहास और किले का टीला

कांमा का इतिहास मध्यकाल में बयाना और सूरसेन क्षेत्र के पराक्रमी जादौन (यादव) राजाओं से गहराई से जुड़ा रहा है। वर्तमान में यहाँ लगभग 30 फीट से 50 फीट तक ऊँचा एक प्राचीन किले का टीला स्थित है, जो कभी इस क्षेत्र की राजनीतिक और सैन्य शक्ति का केंद्र हुआ करता था। समय के थपेड़ों और विदेशी आक्रमणों के कारण आज यह भव्य किला मात्र खंडहरों के ढेर के रूप में अवशिष्ट है, जो अपने भीतर गौरवशाली अतीत को समेटे हुए है।

८४ खंभा या चौसठ खंभा: शिल्पकला का अद्वितीय प्रमाण और विसंगति

कांमा का सबसे प्रमुख और पुरातात्विक रूप से चर्चित स्थल यहाँ का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर परिसर है। इस परिसर को लेकर ब्रिटिश कालीन दस्तावेजों में कुछ विसंगतियां भी देखने को मिलती हैं:

  1. मेजर ड्रेक-ब्रॉकमैन के गजेटियर के अनुसार, इस प्राचीन मंदिर परिसर में ८४ स्तंभ (खंभे) हैं। स्थानीय जनश्रुति और परंपराओं में यह प्रसिद्ध है कि इन खंभों की सटीक गिनती आज तक कोई नहीं कर पाया है।

  2. इसके विपरीत, अलेक्जेंडर कनिंघम ने अपनी एएसआई रिपोर्ट में इस इमारत की पहचान एक मस्जिद के रूप में की और इसे 'चौसठ खंभा' (64 खंभा) नाम से संबोधित किया।

हालांकि, भवन की वास्तुकला, स्तंभों की नक्काशी और संरचनात्मक बनावट का सूक्ष्म अध्ययन करने पर यह अकाट्य रूप से स्पष्ट हो जाता है कि यह मूल रूप से एक भव्य हिंदू मंदिर था। मुस्लिम शासनकाल के दौरान, दिल्ली सल्तनत के आक्रमणों के बाद इस मंदिर की आंतरिक संरचना को आंशिक रूप से बदलकर इसका उपयोग मस्जिद के रूप में किया जाने लगा था।

स्थापत्य और गर्भ गृह की बनावट (Architectural Layout)

यह प्राचीन मंदिर एक बंद चौकोर परिसर (Quadrangle) से घिरा हुआ है, जिसका आंतरिक आंगन 52 फीट 8 इंच लंबा तथा 49 फीट 9 इंच चौड़ा है।

  • मुख्य गलियारे: मंदिर के मुख्य भाग में 8-8 स्तंभों की तीन पंक्तियाँ (Rows) हैं, जो आपस में मिलकर तीन भव्य गलियारों (Aisles) का निर्माण करती हैं।

  • प्रवेश द्वार: मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की ओर स्थित है। इस द्वार की ओर भी 8-8 स्तंभों की दो पंक्तियाँ हैं, जो दो गलियारे बनाती हैं।

  • दिशात्मक विन्यास: उत्तर और दक्षिण दिशाओं में प्रत्येक ओर 6-6 स्तंभों की एक-एक पंक्ति है, जिससे एक-एक गलियारा निर्मित होता है।

  • उत्तर का चबूतरा: दक्षिण दिशा की ओर परिसर को बंद करने वाली एक सादी दीवार है। इसके विपरीत, उत्तर दिशा में एक 74 फीट ऊँचा विशाल चबूतरा है, जिस पर छोटे स्तंभों की एक दोहरी पंक्ति (Double Row) बनी है। यह गलियारा बाहर की ओर खुलता है। यही चबूतरा पूर्व दिशा की ओर भी आगे बढ़ता है, लेकिन प्रवेश द्वार के ठीक दक्षिण वाले हिस्से को बाद में बंद कर दिया गया था।

  • द्वार की असामान्यता: वास्तुशिल्प की दृष्टि से, मुख्य प्रवेश द्वार आंगन के पूर्वी हिस्से के ठीक मध्य (Center) में नहीं है। इसके बाईं ओर (दक्षिण की ओर) की दीवार की लंबाई 24 फीट 2 इंच है, जबकि दाईं ओर (उत्तर की ओर) की दीवार की लंबाई 29 फीट है।

स्तंभों पर अंकित सनातन शिल्पकला और इस्लामी विरूपण (Iconoclasm)

इस मंदिर के सभी स्तंभ वर्गाकार (Square) हैं और अद्भुत एवं जटिल भारतीय शिल्पकला का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रत्येक स्तंभ की विशेषता यह है कि यह दो अलग-अलग स्तंभों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर बनाया गया है, जिसमें निचला स्तंभ ऊपरी स्तंभ की तुलना में अधिक ऊँचा और सुदृढ़ है।

चित्र: कामवन (कांमा) के ८४ खंभा परिसर के स्तंभ पर उकेरी गई भगवान श्री गणेश की प्राचीन विरूपित आकृति। यद्यपि मध्यकाल में इस पर प्रहार कर इसे खंडित करने का प्रयास किया गया, परंतु विग्रह का स्वरूप आज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो इस परिसर के मूलतः एक हिंदू मंदिर होने का अकाट्य पुरातात्विक साक्ष्य है। (चित्र सौजन्य: YSCRI)


मुस्लिम आक्रमण के दौरान इन स्तंभों पर उकेरी गई सनातन देवी-देवताओं की मूर्तियों को क्रूरतापूर्वक खंडित (मूर्तिकला विरूपण) किया गया था। पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान इन स्तंभों पर खंडित अवस्था में भी निम्नलिखित आकृतियों की स्पष्ट पहचान की गई है:

  • माता काली, भगवान श्री गणेश, चार गदाओं को धारण किए हुए भगवान विष्णु और भगवान नरसिंह।

  • इसके अतिरिक्त, स्तंभों पर भारतीय संस्कृति के शुभ प्रतीक जैसे मोर, मगरमच्छ, गोलाकार चक्रनुमा आकृतियां और पुष्प उकेरे गए हैं।

  • स्तंभों के कोनों पर विशेष रूप से दोहरी सर्पनुमा पूंछ वाले नाग विराजमान हैं, जिनकी पूंछ आपस में अत्यंत कलात्मक ढंग से लिपटी हुई दिखाई देती है। साथ ही, कुछ स्थानों पर बड़ी और घूरती हुई आंखों वाले विकृत चेहरे (कीर्तिमुख या भारवाहक यक्ष) भी दिखाई देते हैं, जिनसे छोटे हाथ-पैर जुड़े हैं परंतु शरीर का कोई अवशेष नहीं है।

इल्तुतमिश का अरबी शिलालेख: आक्रमण का ऐतिहासिक साक्ष्य

इस प्राचीन मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर अरबी भाषा का एक शिलालेख खुदा हुआ है। यह शिलालेख द्वार के दाहिनी ओर जमीन से शुरू होकर, दरवाजे के शीर्ष (ऊपर) से गुजरता हुआ बाईं ओर जमीन पर समाप्त होता है।

वर्तमान में यह शिलालेख काफी क्षतिग्रस्त (Effaced) हो चुका है, परंतु इसका जो भाग पठनीय है, वह इस प्रकार है:

"दीन उल सुल्तान उल आलम उल आदिल उल असाम उल मुल्क अबुल मुसफ्फर इल्तितमिश उल सुल्तान"

यह शिलालेख स्पष्ट रूप से दिल्ली सल्तनत के सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (शासनकाल: 1211–1236 ईस्वी) का है, जो कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम और दामाद था। ऐबक की मृत्यु के बाद उसने दिल्ली की सत्ता पर अधिकार किया था। यह शिलालेख प्रमाणित करता है कि इल्तुतमिश के काल में इस क्षेत्र पर मुस्लिम आक्रमण हुआ और इस प्राचीन मंदिर को मस्जिद का रूप देने का प्रयास किया गया।

शूरसेन राजवंश का शिलालेख और बयाना के जादौनों से संबंध

इस मंदिर परिसर के पुरातात्विक अन्वेषण में 'शूरसेन वंश' का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राचीन शिलालेख भी प्राप्त हुआ है। इस शिलालेख की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:

  • इसमें शूरसेन वंश के सात क्रमिक राजाओं का ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है।

  • शिलालेख में इसी राजवंश की रानी वच्छलिका द्वारा एक भव्य विष्णु मंदिर के निर्माण कराए जाने का स्पष्ट वर्णन है।

  • ऐतिहासिक अनुसंधान का निष्कर्ष: इस शिलालेख में वर्णित किसी भी शूरसेन राजा का नाम बयाना के प्रसिद्ध यदुवंशी जादौन (यादव) राजाओं की वंशावली से मेल नहीं खाता है। इतिहासविदों और पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार, यह पूरी तरह से प्रतीत होता है कि यहाँ उल्लिखित राजवंश वास्तव में मथुरा के शूरसेन (सूरसेन) राजाओं की ही एक स्थानीय शाखा थी, जिसने इस क्षेत्र पर शासन किया और इस कलात्मक विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया था।

निष्कर्ष

कामवन (कांमा) का यह ८४/चौसठ खंभा परिसर केवल एक पुरातात्विक ढांचा नहीं है, बल्कि यह भारत के समृद्ध सनातन इतिहास, कलात्मक चरमोत्कर्ष और मध्यकाल में हुए सांस्कृतिक आघातों का एक जीता-जागता गवाह है। प्राथमिक ऐतिहासिक स्रोतों (कनिंघम रिपोर्ट और ब्रिटिश गजेटियर) पर आधारित यह शोध आलेख स्पष्ट करता है कि ब्रजभूमि का यह क्षेत्र शूरसेन राजाओं के काल में वैष्णव संस्कृति का एक महान केंद्र था।

अनुसंधान प्रदाता: योगेश्वर श्रीकृष्ण सांस्कृतिक अनुसंधान संस्थान (YSCRI)

ऐतिहासिक संदर्भ: ब्रिटिश गजेटियर (1905) एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) रिपोर्ट (1882-83)






Thursday, May 28, 2026

Jihad Or Holy War : A necessary concept to be understood by every Indian.

HISTORY OF THE MUSLIM WORLD

 

भारत में जब हम पश्चिमी तरफ के मुस्लिम आक्रमणों के इतिहाकर को पढ़ते है तो अक्सर भारतीय राजाओं के विरूद्ध  जिहाद और Holy War जैसे शब्द मिलते है। जिहाद और Holy War का उल्लेख महमूद गजनवी से लेकर बाबर तक के विवरण में मिलता है।


वर्ष 1930 ई० में Khan Bahadur Ahsanullah द्वारा लिखित पुस्तक HISTORY OF THE MUSLIM WORLD में Jihad Or Holy War का उल्लेख है।


खान बहादुर साहब Jihad Or Holy War के उल्लेख में लिखते है कि जीते हुए इलाकों के लोगों को हमेशा सबसे पहले खलीफ़ा इस्लाम कबूल करने के लिए कहता था। अगर वे एतराज़ करते तो उन्हें खलीफ़ा की हुकूमत माननी पड़ती और अपनी बात मानने के लिए जजिया या कैपिटेशन-टैक्स देना पड़ता था। लेकिन जजिया देने से मना करने पर किसी की जान या माल की ज़ब्ती नहीं होती थी। जिहाद या पवित्र युद्ध उन लोगों के खिलाफ़ घोषित किया जाता था जो इस्लाम कबूल करने से मना करते थे और लड़ाई की पेशकश करते थे। जीते हुए लोगों से लूटे गए माल का, पाँच में से चार हिस्सा जीतने वाली सेना का होता था। जो लोग इस्लाम कबूल कर लेते थे, वे इस्लामी समुदाय में शामिल हो जाते थे और उसके खास अधिकार पाने के हकदार होते थे।


भारत के हिन्दू राजाओं के विरुद्ध अनेक मुस्लिम इतिहासकारों ने आक्रमणकारियों के ऐतिहासिक वृतांतों में जिहाद या पवित्र युद्ध का उल्लेख किया है।


इन युद्धों के बाद मंदिरों को तोड़ने, हिन्दू नरसंहार,जजिया, धर्मांतरण जैसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है।


भारतीयों को इतिहास में घटी घटनाओं की सही जानकारी होनी चाहिए, ताकि भविष्य में इतिहास को ध्यान में रखकर सही निर्णय ले सकें और भारत की एकता व अखंडता चिरकाल तक सुनिश्चित की जा सकें।


वर्ष 1947 ई० का भारत विभाजन हर भारतीय के सीने पर एक घाव है।

Wednesday, May 27, 2026

जौनपुर का रतागढ़ या जाफराबाद और महाराज जयचन्द्र का किला।

 

Symbolic Picture of the Jaychandra Fort with ASI record. 


उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में जौनपुर शहर के निकट स्थित जाफराबाद अपने आप में इतिहास व उसके विध्वंस की कहानी समेटे है।


गोमती नदी के किनारे स्थित जाफराबाद मूल रूप से एक सनातन सभ्यता का केंद्र है।


ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार कन्नौज के राष्ट्रकूट (राठौड़/गहरवार) राजाओं के अधीन जाफराबाद का मूल नाम रतागढ़ (Ratagarh) मिलता है।


यहाँ पर महाराज विजयचंद्र, महाराज जयचंद्र व उनके पुत्रों द्वारा शासन का उल्लेख मिलता है।


वर्ष 1908 ई० के जौनपुर गजेटियर इसका एक पुराना नाम मनाइच (Manaichh) का उल्लेख है।


वही वर्ष 1889 ई० की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट  ARCHAEOLOGICAL  SURVEY OF INDIA, NEW SERIES, VOLUME 1, NORTH-WESTERN PROVINCES AND OUDH: JAUNPUR, &c.  में जाफराबाद के पुराने नाम रतागढ़ (Ratagarh) का उल्लेख है।


वर्ष 1908 ई० के जौनपुर गजेटियर में लिखा है कि महमूद गजनी ने बनारस के चंद्रपाल से यह रतागढ़ को जीता था जोकि बाद में कन्नौज के राष्ट्रकूट राजाओं के अधीन आ गया। मोहम्मद गौरी ने महाराज जयचंद्र राठौड़ के पुत्रों से रतागढ़ जीता जोकि बाद पुनः गहरवारों के अधीन आ गया।


मोहम्मद तुगलक के तीसरे पुत्र जफर खान व रतागढ़ के सकत सिंह के बीच हुए युद्ध में, सकत सिंह की वीरगति के पश्चात जफर खान ने रतागढ़ का नाम जाफराबाद कर दिया।


रतागढ़ (वर्तमान जाफराबाद) में सहन-ए-शहीदान या शहीदों का मैदान स्थान है यह विभिन्न मुस्लिम आक्रमणों में मारे गए लोगों का कब्रिस्तान है।


रतागढ़ का किला करीब 18 एकड़ में फैला है। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन एक संरक्षित स्मारक है।


भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन रतागढ़ The walls of the Kankar-fort of Jaychandra नाम से वर्ष 1920 ई० से वर्तमान समय तक संरक्षित है।



18 एकड़ में फैला रतागढ़ किला दीवारों से घिरा है जिसकी कुछ दीवारों की ऊंचाई 25-50 फ़ीट तक है। इस किले की सतह से नीचे खुदाई करने पर कई फ़ीट गहराई में बड़ी बड़ी ईंटे मिलती है।


इसकी शैली हिन्दू शैली है, यह महल कन्नौज के राजाओं का महल हुआ करता था, यहाँ पर गुप्त कालीन सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए है।


वहीं मुस्लिम अभिलेखों में इसका नाम असनी मिलता है। यह पूरा इलाका टीलों से भरा पड़ा था जोकि हिन्दू महलों और मंदिरों को दर्शाते थे।


यहाँ पर शेख बरन की मस्जिद स्थित है जिसके स्तंभ हिन्दू शैली के है। इसकी छत समतल है इसके हॉल की ऊँचाई 18 फ़ीट है जिसमें पूर्व से पश्चिम तक नौ व उत्तर से दक्षिण तक सात खंड है। स्तंभों की बाहरी पंक्तियां दोहरी है और सबसे बाहरी स्तम्भों की बीच की जगह को सदी दीवारों से भरा गया है। इसमें कुल 56 स्तम्भ है जोकि वर्गाकार है जोकि स्पष्ट रूप से हिन्दू मूल के है।


यह स्तम्भ कन्नौज के राजा विजयचंद्र द्वारा बनाये गए मन्दिर के भाग है इस मंदिर के भवन का मस्जिद के रूप में उपयोग जफर खान द्वारा शुरू किया गया।


यहाँ पर मौलाना बहराम व शेख बरन की कब्रें है, मौलाना बहराम को जफर खान द्वारा मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए नियुक्त किया गया था, शेख बरन , मौलाना बहराम के ही वंशज थे।


मुस्लिम शासन आने के बाद यहाँ मुस्लिम शासन का प्रभाव दिखता है जिसके मूल में आज भी हिंदू शैली के भवन व इतिहास दिखता है।

Monday, May 18, 2026

सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने युद्धक्षेत्र में वीरगति प्राप्त की थी।

History of India by M. Elphinstone


 वर्ष 1843 ई० में प्रकाशित अंग्रेज अधिकारी माउंटस्टुअर्ट एलफिंस्टन ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ इंडिया में सम्राट पृथ्वीराज चौहान व मोहम्मद गौरी के तराइन के दूसरे युद्ध के बारे में लिखा है।


सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को आगे न बढ़ने के लिए संदेश भेजा जिस गौरी के जनरल ने आदेश के लिए समय मांगा।



सम्राट पृथ्वीराज चौहान व मोहम्मद गौरी की सेनाओं के कैम्प पास-पास थे बीच में एक नाला था।


मोहम्मद गौरी ने भोर होते ही बीच के नाले को पार कर सम्राट पृथ्वीराज चौहान की सेना के कैम्प पर हमला कर दिया जिससे अफरा-तफरी मच गई। 


अपनी योजना में विफल होने के बाद गौरी भागने लगा जिसका पीछा सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने किया।


 सेना से दूर होते ही गौरी के पहले से तैयार 12000 सैनिकों ने महाराज पृथ्वीराज चौहान और उनके सरदारों को घेर लिया, महाराज पृथ्वीराज चौहान और उनके सरदारों को युद्ध क्षेत्र में ही मार दिया।


सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने युद्ध क्षेत्र में ही वीरगति प्राप्त की थी उन्हें न तो गजनी ले जाया गया और न ही उन्हें अंधा किया गया।


1206 ई० में खोखर राजपूतों ने गौरी की हत्या कर दी।


जिस समय गौरी ने हमला किया वह युद्ध विराम का समय था, गौरी यह जानता था कि वो कभी नियमों से युद्ध नहीं जीत सकता।


इतिहास में सच लिखा है लेकिन क्षत्रियों को अपमानित करने के लिए झूठ प्रचारित किया जाता है।