Wednesday, May 27, 2026

जौनपुर का रतागढ़ या जाफराबाद और महाराज जयचन्द्र का किला।

 

Symbolic Picture of the Jaychandra Fort with ASI record. 


उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में जौनपुर शहर के निकट स्थित जाफराबाद अपने आप में इतिहास व उसके विध्वंस की कहानी समेटे है।


गोमती नदी के किनारे स्थित जाफराबाद मूल रूप से एक सनातन सभ्यता का केंद्र है।


ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार कन्नौज के राष्ट्रकूट (राठौड़/गहरवार) राजाओं के अधीन जाफराबाद का मूल नाम रतागढ़ (Ratagarh) मिलता है।


यहाँ पर महाराज विजयचंद्र, महाराज जयचंद्र व उनके पुत्रों द्वारा शासन का उल्लेख मिलता है।


वर्ष 1908 ई० के जौनपुर गजेटियर इसका एक पुराना नाम मनाइच (Manaichh) का उल्लेख है।


वही वर्ष 1889 ई० की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट  ARCHAEOLOGICAL  SURVEY OF INDIA, NEW SERIES, VOLUME 1, NORTH-WESTERN PROVINCES AND OUDH: JAUNPUR, &c.  में जाफराबाद के पुराने नाम रतागढ़ (Ratagarh) का उल्लेख है।


वर्ष 1908 ई० के जौनपुर गजेटियर में लिखा है कि महमूद गजनी ने बनारस के चंद्रपाल से यह रतागढ़ को जीता था जोकि बाद में कन्नौज के राष्ट्रकूट राजाओं के अधीन आ गया। मोहम्मद गौरी ने महाराज जयचंद्र राठौड़ के पुत्रों से रतागढ़ जीता जोकि बाद पुनः गहरवारों के अधीन आ गया।


मोहम्मद तुगलक के तीसरे पुत्र जफर खान व रतागढ़ के सकत सिंह के बीच हुए युद्ध में, सकत सिंह की वीरगति के पश्चात जफर खान ने रतागढ़ का नाम जाफराबाद कर दिया।


रतागढ़ (वर्तमान जाफराबाद) में सहन-ए-शहीदान या शहीदों का मैदान स्थान है यह विभिन्न मुस्लिम आक्रमणों में मारे गए लोगों का कब्रिस्तान है।


रतागढ़ का किला करीब 18 एकड़ में फैला है। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन एक संरक्षित स्मारक है।


भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन रतागढ़ The walls of the Kankar-fort of Jaychandra नाम से वर्ष 1920 ई० से वर्तमान समय तक संरक्षित है।



18 एकड़ में फैला रतागढ़ किला दीवारों से घिरा है जिसकी कुछ दीवारों की ऊंचाई 25-50 फ़ीट तक है। इस किले की सतह से नीचे खुदाई करने पर कई फ़ीट गहराई में बड़ी बड़ी ईंटे मिलती है।


इसकी शैली हिन्दू शैली है, यह महल कन्नौज के राजाओं का महल हुआ करता था, यहाँ पर गुप्त कालीन सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए है।


वहीं मुस्लिम अभिलेखों में इसका नाम असनी मिलता है। यह पूरा इलाका टीलों से भरा पड़ा था जोकि हिन्दू महलों और मंदिरों को दर्शाते थे।


यहाँ पर शेख बरन की मस्जिद स्थित है जिसके स्तंभ हिन्दू शैली के है। इसकी छत समतल है इसके हॉल की ऊँचाई 18 फ़ीट है जिसमें पूर्व से पश्चिम तक नौ व उत्तर से दक्षिण तक सात खंड है। स्तंभों की बाहरी पंक्तियां दोहरी है और सबसे बाहरी स्तम्भों की बीच की जगह को सदी दीवारों से भरा गया है। इसमें कुल 56 स्तम्भ है जोकि वर्गाकार है जोकि स्पष्ट रूप से हिन्दू मूल के है।


यह स्तम्भ कन्नौज के राजा विजयचंद्र द्वारा बनाये गए मन्दिर के भाग है इस मंदिर के भवन का मस्जिद के रूप में उपयोग जफर खान द्वारा शुरू किया गया।


यहाँ पर मौलाना बहराम व शेख बरन की कब्रें है, मौलाना बहराम को जफर खान द्वारा मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए नियुक्त किया गया था, शेख बरन , मौलाना बहराम के ही वंशज थे।


मुस्लिम शासन आने के बाद यहाँ मुस्लिम शासन का प्रभाव दिखता है जिसके मूल में आज भी हिंदू शैली के भवन व इतिहास दिखता है।

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