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| FRAGMENTS OF THE INDIKA OF MEGASTHENES |
भारतीय सभ्यता को अधिकांश एक शोषित सामाजिक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, यह कहीं लिखित नहीं है किन्तु एक व्यवहारिक रूप से भारतीय सभ्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाने के उद्देश्य से कहा जाता है। क्या चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में भारतीय समाज में शोषण होता था ?
क्या वास्तव में भारतीय सभ्यता मूल रूप से एक शोषित सामाजिक व्यवस्था थी या फिर शोषण विदेशी आक्रमणों के एक प्रभाव के रूप में आया, इसे हम चन्द्रगुप्त मौर्य के काल की सामाजिक व्यवस्था से समझने का प्रयास करेगे कि चन्द्रगुप्त मौर्य के समय भारतीय समाज की क्या स्थिति थी ?
सेल्युकस निकेटर का दूत मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के समय भारत आया और उसने अपनी पुस्तक इंडिका में भारत का विवरण दिया है। इंडिका का अंग्रेजी में अनुवाद Fragements of Indika of Megasthenes नाम से Dr. E.A. Schwanbeck द्वारा किया गया। इस पुस्तक के पेज संख्या - 83 से 86 तक चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्यकाल में सामाजिक व्यवस्था का उल्लेख किया गया है। मेगस्थनीज ने जाति व वर्ग दोनों शब्दों का उपयोग किया है।
प्रथम जाति अथवा वर्ग
प्रथम जाति अथवा वर्ग दार्शनिकों (Philosophers) का था जिन्हें समाज में प्रथम स्थान प्राप्त था। दार्शनिकों की संख्या कम थी। दार्शनिकों की सेवाएं सभी व्यक्ति निजी रूप से ले सकते है जोकि यज्ञ या पवित्र अनुष्ठान करना चाहते है। सार्वजनिक रूप से दार्शनिकों की सेवाएं राजा द्वारा भी ली जाती है जिसे महान सभा कहा जाता है, जिसमें नए साल के आरंभ में सभी दार्शनिक राजा के समक्ष द्वार पर एकत्रित होते है। जब कोई दार्शनिक लिखित रूप से फसल, पशु सुधार या सार्वजनिक हित का कोई उपाय देता है तो उसे सार्वजनिक रूप से घोषित किया जाता है। जो दार्शनिक तीन बार झूठे उपाय या सूचना देता है तो कानून द्वारा जीवन भर मौन रहने का दंड दिया जाता है परन्तु जो सही सलाह देता है उसे किसी भी कर अथवा अंशदान से छूट दी जाती है।
दूसरी जाति अथवा वर्ग
दूसरी जाति में किसान शामिल है जो कि जनसंख्या का बडा हिस्सा बनाते है, जो स्वभाव से अत्यन्त सौम्य और विनम्र होते है। किसानों को सैन्य सेवा से छूट प्राप्त हैं। किसान बिना किसी भय के अपनी भूमि पर खेती करते है। किसान कभी नगर नहीं जाते न तो हो-हल्ला में भाग लेने और न ही किसी अन्य उद्देश्य से। इसलिए ऐसा देखा गया है कि देश में एक हिस्से में पुरूषों को युद्ध की तैयारी में भाग लेकर अपने जीवन को जोखिम में डालते हुए युद्ध लडते हुए देखा जा सकता है तो दूसरी तरफ पास में किसान पूरी सुरक्षा में अपने खेत में हल चला रहे होते है, खुदाई कर रहे होते है और सैनिक उनकी रक्षा कर रहे होते है। सारी भूमि राजा की है किसान उपज का एक चौथाई हिस्सा प्राप्त करने की शर्त पर खेती करते है।
तीसरी जाति अथवा वर्ग
तीसरी जाति चरवाहे व शिकारियों की है , जिन्हें ही शिकार करने, मवेशी पालने और हल चलाने वाले पशुओं को बेचने या किराए पर देने की अनुमति है। खेतों मे बोए गए बीजों को खाने वाले जंगली जानवरों और पक्षियों से भूमि को साफ करने के बदले में उन्हें राजा से अनाज का भत्ता मिलता है। वे घुमंतू जीवन व्यतीत करते है व तंबुओं में रहते है।
चौथी जाति अथवा वर्ग
चरवाहों और शिकारियों के बाद चौथा वर्ग उन लोगों का है जो व्यापार करते है, जो सामान बेचते है, जो शारीरिक श्रम में लगे है। इनमें से कुछ कर अदा करते है और राज्य को कुछ निर्धारित सेवाएं प्रदान करते है, लेकिन कवच बनाने वाले और जहाज निर्माता राजा से मजदूरी और भोजन प्राप्त करते है, जो अकेले काम करते है। सेनापति सेना सैनिकों को हथियार उपलब्ध करवाता है और नौसेना का एडमिरल यात्रियों और माल दोनों के परिवहन के लिए जहाज किराए पर देता है।
पाँचवी जाति अथवा वर्ग
पाँचवा वर्ग योद्धाओं का है जो शांति काल में आलस्य और शराब पीने में समय व्यतीत करते है। उनका भरण-पोषण राजा के खर्चे पर होता है। यह लोग युद्ध का अवसर आने पर हमेशा मैदान में जाने के लिए तैयार रहते है।
छठी जाति अथवा वर्ग
छठे वर्ग में निरीक्षक होते है जिन्हें सभी गतिविधियों पर नजर रखने और राजा को गुप्त रूप से रिपोर्ट देने का कार्य सौंपा जाता है और अन्य को सेना का। पहले वर्ग के निरीक्षक नगर की वेश्याओं को अपने सहायक के रूप में नियुक्त करते है, और दूसरे वर्ग के निरीक्षक शिविर की वैश्याओं को। इन पदों पर सबसे योग्य व भरोसेमंद व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता है।
सातवीं जाति अथवा वर्ग
सातवें वर्ग में राजा के सलाहकार और कर निर्धारक शामिल है। सर्वोच्च सरकारी पद, न्यायाधिकरण और सार्वजनिक मामलों का सामान्य प्रशासन इन्हीं के अंतर्गत आता है।
