Wednesday, June 3, 2026

इतिहास के झरोखे से: जानिए वर्ष 1872 की जनगणना में रुहेलखंड और मध्य दोआब के राजपूत राजवंशों की स्थिति।

 

Source- Statistical, Descriptive And Historical Account Of The North-Werstern Provinces Of INDIA. (Image courtesy of YSCRI)


मुख्य बातें (Highlights):

  • ब्रिटिश काल की पहली जनगणना (1872) के दुर्लभ ऐतिहासिक आंकड़े।

  • बदायूँ, फर्रूखाबाद और बरेली जनपदों में विभिन्न राजपूत शाखाओं की जनसांख्यिकी।

  • इतिहास प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़।

विशेष लेख: भारतीय इतिहास में जनसांख्यिकी (Demography) का अध्ययन हमेशा से ही सामाजिक और राजनीतिक संरचना को समझने का एक मुख्य जरिया रहा है। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1872 ई० में हुई देश की पहली आधिकारिक जनगणना एक ऐसा ही महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी। इस जनगणना ने न केवल आबादी के आंकड़े सामने रखे, बल्कि तत्कालीन उत्तर प्रदेश (तब के नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविंसेज) के अलग-अलग जिलों में विभिन्न राजवंशों और कुलों की स्थिति को भी स्पष्ट किया।

आज हम इस लेख में 1872 की जनगणना के उन दुर्लभ आंकड़ों पर नज़र डालेंगे, जो हमारे तीन प्रमुख ऐतिहासिक जनपदों — बदायूँ, फर्रूखाबाद और बरेली में राजपूत (क्षत्रिय) राजवंशों की आबादी और उनकी शाखाओं को दर्शाते हैं।

1. जनपद बदायूँ: गौर और चौहान राजवंशों का दबदबा

वर्ष 1872 की जनगणना के अनुसार, बदायूँ जनपद में राजपूतों की कई शाखाएं निवास कर रही थीं, जिनमें गौर और चौहान वंश की जनसंख्या सबसे अधिक थी।

  • गौर: 6,976

  • चौहान: 6,813

  • बैस: 5,663

  • कठेरिया: 4,744

  • तोमर: 4,690

  • राठौर: 4,303

  • बडगूजर: 2,882

  • सोलंकी: 1,615

अन्य सम्मलित शाखाएं: मुख्य कुलों के अलावा सिकरवार, कठिया, गौतम, जंगोरी, पुंढीर, गहलोत, धाकरे, बच्छल, सोमवंशी, परमार, बघेल, भिटला, रघुवंशी, सावंत, भट्टी, कछवाहा, चंदेल, रैकवार, जांगरा, जादौन, गहरवार, भदौरिया और गौर कसमानी जैसी अन्य उप-शाखाओं की कुल सम्मिलित जनसंख्या 23,799 दर्ज की गई थी।

2. जनपद फर्रूखाबाद: राठौर और बैस राजवंशों की प्रधानता

गंगा के तट पर बसे ऐतिहासिक जनपद फर्रूखाबाद में राठौर और बैस राजवंशों की आबादी सबसे प्रमुख थी। 1872 के आंकड़े कुछ इस प्रकार थे:

  • राठौर: 8,883

  • बैस: 8,704

  • गौर: 5,982

  • सोमवंशी: 5,634

  • चौहान: 5,179

  • गहरवार: 4,148

  • परमार: 2,261

  • कठेरिया: 2,168

अन्य सम्मलित शाखाएं: फर्रूखाबाद में इनके अलावा भी राजपूत संस्कृति की एक बड़ी विविधता थी। यहाँ सम्मलित रूप से भल, भदौरिया, बच्छल, बघेल, चंदेल, गहलोत, कछवाहा, निकुंभ, परिहार, सेंगर, उज्जैनी, जांगडा, बडगूजर, सोलंकी, कमवार, गौतम, रघुवंशी, तमता, रैकवार, चमरगौर, गोरखिया, अजुधिवंशी, बुंदेला, भिमला, चन्द्रवंशी, सिकरवार, जैसवार, बमनगौर, बमटेला और बिसेन राजवंशों के लोग भी निवास कर रहे थे।

3. जनपद बरेली: चौहान और कठेरिया राजवंशों का गढ़

रुहेलखंड के केंद्र बरेली में चौहान और इस क्षेत्र के मूल ऐतिहासिक शासक माने जाने वाले कठेरिया राजपूतों की आबादी सबसे आगे थी।

  • चौहान: 9,950

  • कठेरिया: 8,652

  • जांगडा: 6,611

  • राठौर: 3,163

  • गौर: 2,730

  • सोमवंशी: 2,292

  • बैस: 1,358

  • गौतम: 824

अन्य सम्मलित शाखाएं: बरेली जनपद में भदौरिया, थापा, बडगूजर, बच्छल, कछवाहा, कठिया, सिकरवार, परमार, चंदेल, कश्यप, जादौन, निकुंभ, सेंगर, तोमर, सावंत, रैकवार, किनवार, रावत, गोहिल, सोलंकी, बुंदेला और गहलोत राजवंशों की कुल सम्मिलित जनसंख्या 3,542 थी।

ऐतिहासिक महत्व और निष्कर्ष

ये आंकड़े बताते हैं कि 19वीं सदी के उत्तरार्ध में रुहेलखंड और मध्य दोआब के इन तीन जिलों में राजपूतों की 30 से भी अधिक शाखाएं और उप-शाखाएं सक्रिय रूप से निवास कर रही थीं। बदायूँ में गौर, फर्रूखाबाद में राठौर और बरेली में चौहान वंश संख्या के मामले में अपनी-अपनी जगहों पर शीर्ष पर थे।

इतिहास के नजरिए से यह डेटा इस बात का गवाह है कि सदियों के उतार-चढ़ाव और राजनीतिक बदलावों के बावजूद इन क्षेत्रों में विभिन्न क्षत्रिय कुलों की सामाजिक उपस्थिति कितनी गहरी और विविधतापूर्ण रही है। आज के समय में ये आंकड़े समाजशास्त्रियों और क्षेत्रीय इतिहास के शोधकर्ताओं के लिए एक अनमोल धरोहर हैं।

Research - Yogeshwar Shri Krishna Cultural Research Institute (YSCRI)

Source- Statistical, Descriptive And Historical Account Of The North-Werstern Provinces Of INDIA.

Tuesday, June 2, 2026

इतिहास के पन्नों से: जानिए 1872 की जनगणना में एटा, मैनपुरी और इटावा में क्या थी क्षत्रिय समाज की स्थिति?



Source: Statistical, Descriptive And Historical Account of North-Western Provinces of India, Year 1876 A.D., Courtesy of  YSCRI



ऐतिहासिक अभिलेखों के झरोखे से

 आज हम डिजिटल युग में जी रहे हैं, जहाँ आबादी के आँकड़े एक क्लिक पर मिल जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज से लगभग 150 साल पहले हमारे समाज और क्षेत्र की जनसांख्यिकी (Demographics) कैसी थी?


वर्ष 1876 ई० में ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रकाशित स्टेटिकल गजेटियर (Statistical, Descriptive And Historical Account of North-Western Provinces of India) में एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक डेटा मिलता है। यह डेटा वर्ष 1872 ई० में हुई भारत की पहली क्रमिक जनगणना पर आधारित है, जो उत्तर प्रदेश के 'लोअर दोआब' क्षेत्र के तीन प्रमुख जनपदों—एटा, मैनपुरी और इटावा में क्षत्रिय (राजपूत) समाज की विभिन्न शाखाओं और उनकी जनसंख्या की स्थिति को दर्शाता है।


आइए देखते हैं उस दौर में इन तीनों जनपदों में किस वंश के क्षत्रियों की कितनी आबादी थी:

1. जनपद एटा: चौहान और सोलंकी राजवंशों की प्रधानता


1872 की जनगणना के अनुसार, एटा जनपद में चौहान और सोलंकी क्षत्रियों की संख्या सबसे अधिक दर्ज की गई थी।


चौहान: 16,918

सोलंकी: 8,977

राठौर: 7,775

कटिया: 3,397

गौर: 3,162

गौरहर: 2,617

बैस: 2,259

पुंडीर: 1,890

तोमर: 1,789

बडगूजर: 1,398

जादौन: 868

गहलोत: 666


 2. जनपद मैनपुरी: चौहान राजवंश का विशाल गढ़


मैनपुरी हमेशा से ही चौहान राजवंश का एक मजबूत केंद्र रहा है। 1872 के आँकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं, जहाँ चौहानों की संख्या 26 हजार से अधिक थी।


चौहान:  26,854

किरार:  7,538

बैस:  4,415

राठौर:  2,598

गहरवार:  2,469

तोमर:  2,173 

धाकरे:  1,925

टांक:  1,596

भदौरिया:  1,400

1,000 से कम जनसंख्या वाले वंश:

 मैनपुरी जनपद में कई अन्य क्षत्रिय शाखाएँ भी निवास कर रही थीं, जिनकी आबादी 1,000 से कम थी। इनमें प्रमुख रूप से बडगूजर, बच्छल, बघेल, बांगर, भाले सुल्तान, चंदेल, चन्द्रवंशी, दीक्षित, डोर, गहलोत, गौतम, जैसवार, जांगरा, जदुवंशी, कठेरिया, कछवाहा, निकुंभ, निर्मल, परमार, परिहार, रघुवंशी, रैकवार, राणा, सिकरवार, सूर्यवंशी, सोलंकी, सोमवंशी, सेंगर और उजम शामिल थे।


 3. जनपद इटावा: सिकरवार और चौहानों का बाहुल्य


इटावा जनपद में क्षत्रिय समाज का एक बेहद विविध रूप देखने को मिलता है। यहाँ सिकरवार और चौहान राजवंशों की आबादी सबसे प्रमुख थी।


सिकरवार:  12,952

चौहान:  10,984

कछवाहा: 5,213

परिहार:  3,881

भदौरिया:  3,667

गौर:  2,766

सेंगर:  2,473

गहलोत:  1,724

बैस:  1,291

राठौर:  1,099

बमनगौर:  948


800 से कम जनसंख्या वाले वंश:

 इटावा में भी एक बहुत बड़ा वर्ग उन राजपूत वंशों का था जिनकी व्यक्तिगत आबादी 800 से कम थी। इस सूची में बडगूजर, बच्छल, बुंदेला, बांगर, चंदेल, छोंकर, चमरगौर, धाकरे, दीक्षित, गहरवार, गौतम, गोलम, जैसवार, जानवर, जादौन, जसावत, किनवार, कठेरिया, किरार, काठी, कटियार, निकुंभ, उज्जैनी, परमार, पुंडीर, परवार, पच्छी, रघुवंशी, रैकवार, सोमवंशी और तोमर जैसे गौरवशाली वंश शामिल थे।


 इतिहास में इस दस्तावेज़ का महत्व


ब्रिटिश सरकार द्वारा वर्ष 1876 ई० में जारी किया गया यह स्टेटिकल गजेटियर (Statistical, Descriptive And Historical Account of North-Western Provinces of India) आज के समाजशास्त्रियों और इतिहासकारों के लिए एक अमूल्य धरोहर है। यह आँकड़े हमें बताते हैं कि उत्तर प्रदेश के इस दोआब क्षेत्र (गंगा-यमुना के बीच का मैदान) के सामाजिक ताने-बाने को गढ़ने में क्षत्रिय समाज की विभिन्न शाखाओं का कितना बड़ा और व्यापक योगदान रहा है। 150 साल पुराने ये आँकड़े आज भी हमारे पूर्वजों की विरासत और क्षेत्रीय इतिहास को समझने का एक प्रामाणिक जरिया हैं।


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Research by -  Yogeshwar Shri Krishna Cultural Research Institute (YSCRI)

Soruce - Statistical, Descriptive And Historical Account of North-Western Provinces of India, Year 1876 A.D.

Sunday, May 31, 2026

प्रभु श्रीकृष्ण की क्रीड़ा स्थली 'कामवन' (कांमा) और उसका विस्मृत पुरातात्विक वैभव।


स्तंभ पर अंकित त्रिभंग मुद्रा में खड़े भगवान श्रीकृष्ण का विरूपित विग्रह, जो कामवन के प्राचीन गौरव और वैष्णव संस्कृति के चरमोत्कर्ष को दर्शाता है। (चित्र सौजन्य: YSCRI)


प्रस्तावना: ब्रजमंडल का ऐतिहासिक हृदय 'ब्रह्मपुर'

सनातन धर्म और संस्कृति में ब्रज चौरासी कोस का अत्यंत पावन और ऐतिहासिक महत्व है। इसी ब्रज क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली प्रभु श्रीकृष्ण की अनन्य क्रीड़ा स्थली है 'कामवन', जिसे आधुनिक समय में 'कांमा' के नाम से जाना जाता है। भौगोलिक दृष्टि से यह ऐतिहासिक स्थल वर्तमान में राजस्थान के नवगठित डीग जिले (पूर्व में भरतपुर जिला) के अंतर्गत आता है।

ऐतिहासिक और पौराणिक कालखंड में इस क्षेत्र को 'ब्रह्मपुर' के नाम से जाना जाता था। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान पूर्व राजपूताना के राजनीतिक एजेंट और अंग्रेज अधिकारी मेजर एच.ई. ड्रेक-ब्रॉकमैन (Major H.E. DRAKE BROCKMAN) द्वारा संकलित 'A Gazetteer of Eastern Rajputana Comprising the Native States of Bharatpur, Dholpur & Karauli' (1905) के अनुसार, कांमा ब्रज क्षेत्र में हिंदुओं का एक अत्यंत पवित्र स्थान है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रारंभिक जीवन (बाल्यकाल) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बिताया था। इस गजेटियर के अनुसार, प्रभु श्रीकृष्ण के  नाना  'कामसेन' के नाम  पर इस स्थान का नाम  'कांमा' पड़ा।

दूसरी ओर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के प्रथम महानिदेशक सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने वर्ष 1882-83 की अपनी पुरातात्विक रिपोर्ट 'A Tour in Eastern Rajputana' में एक अन्य मत प्रस्तुत किया है। कनिंघम के अनुसार, 'कांमा' नाम यहाँ बहुतायत में पाए जाने वाले पवित्र 'कदम्ब वन' का ही एक संकुचित रूप या अपभ्रंश है।

जादौन राजाओं का इतिहास और किले का टीला

कांमा का इतिहास मध्यकाल में बयाना और सूरसेन क्षेत्र के पराक्रमी जादौन (यादव) राजाओं से गहराई से जुड़ा रहा है। वर्तमान में यहाँ लगभग 30 फीट से 50 फीट तक ऊँचा एक प्राचीन किले का टीला स्थित है, जो कभी इस क्षेत्र की राजनीतिक और सैन्य शक्ति का केंद्र हुआ करता था। समय के थपेड़ों और विदेशी आक्रमणों के कारण आज यह भव्य किला मात्र खंडहरों के ढेर के रूप में अवशिष्ट है, जो अपने भीतर गौरवशाली अतीत को समेटे हुए है।

८४ खंभा या चौसठ खंभा: शिल्पकला का अद्वितीय प्रमाण और विसंगति

कांमा का सबसे प्रमुख और पुरातात्विक रूप से चर्चित स्थल यहाँ का एक अत्यंत प्राचीन मंदिर परिसर है। इस परिसर को लेकर ब्रिटिश कालीन दस्तावेजों में कुछ विसंगतियां भी देखने को मिलती हैं:

  1. मेजर ड्रेक-ब्रॉकमैन के गजेटियर के अनुसार, इस प्राचीन मंदिर परिसर में ८४ स्तंभ (खंभे) हैं। स्थानीय जनश्रुति और परंपराओं में यह प्रसिद्ध है कि इन खंभों की सटीक गिनती आज तक कोई नहीं कर पाया है।

  2. इसके विपरीत, अलेक्जेंडर कनिंघम ने अपनी एएसआई रिपोर्ट में इस इमारत की पहचान एक मस्जिद के रूप में की और इसे 'चौसठ खंभा' (64 खंभा) नाम से संबोधित किया।

हालांकि, भवन की वास्तुकला, स्तंभों की नक्काशी और संरचनात्मक बनावट का सूक्ष्म अध्ययन करने पर यह अकाट्य रूप से स्पष्ट हो जाता है कि यह मूल रूप से एक भव्य हिंदू मंदिर था। मुस्लिम शासनकाल के दौरान, दिल्ली सल्तनत के आक्रमणों के बाद इस मंदिर की आंतरिक संरचना को आंशिक रूप से बदलकर इसका उपयोग मस्जिद के रूप में किया जाने लगा था।

स्थापत्य और गर्भ गृह की बनावट (Architectural Layout)

यह प्राचीन मंदिर एक बंद चौकोर परिसर (Quadrangle) से घिरा हुआ है, जिसका आंतरिक आंगन 52 फीट 8 इंच लंबा तथा 49 फीट 9 इंच चौड़ा है।

  • मुख्य गलियारे: मंदिर के मुख्य भाग में 8-8 स्तंभों की तीन पंक्तियाँ (Rows) हैं, जो आपस में मिलकर तीन भव्य गलियारों (Aisles) का निर्माण करती हैं।

  • प्रवेश द्वार: मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की ओर स्थित है। इस द्वार की ओर भी 8-8 स्तंभों की दो पंक्तियाँ हैं, जो दो गलियारे बनाती हैं।

  • दिशात्मक विन्यास: उत्तर और दक्षिण दिशाओं में प्रत्येक ओर 6-6 स्तंभों की एक-एक पंक्ति है, जिससे एक-एक गलियारा निर्मित होता है।

  • उत्तर का चबूतरा: दक्षिण दिशा की ओर परिसर को बंद करने वाली एक सादी दीवार है। इसके विपरीत, उत्तर दिशा में एक 74 फीट ऊँचा विशाल चबूतरा है, जिस पर छोटे स्तंभों की एक दोहरी पंक्ति (Double Row) बनी है। यह गलियारा बाहर की ओर खुलता है। यही चबूतरा पूर्व दिशा की ओर भी आगे बढ़ता है, लेकिन प्रवेश द्वार के ठीक दक्षिण वाले हिस्से को बाद में बंद कर दिया गया था।

  • द्वार की असामान्यता: वास्तुशिल्प की दृष्टि से, मुख्य प्रवेश द्वार आंगन के पूर्वी हिस्से के ठीक मध्य (Center) में नहीं है। इसके बाईं ओर (दक्षिण की ओर) की दीवार की लंबाई 24 फीट 2 इंच है, जबकि दाईं ओर (उत्तर की ओर) की दीवार की लंबाई 29 फीट है।

स्तंभों पर अंकित सनातन शिल्पकला और इस्लामी विरूपण (Iconoclasm)

इस मंदिर के सभी स्तंभ वर्गाकार (Square) हैं और अद्भुत एवं जटिल भारतीय शिल्पकला का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रत्येक स्तंभ की विशेषता यह है कि यह दो अलग-अलग स्तंभों को एक-दूसरे के ऊपर रखकर बनाया गया है, जिसमें निचला स्तंभ ऊपरी स्तंभ की तुलना में अधिक ऊँचा और सुदृढ़ है।

चित्र: कामवन (कांमा) के ८४ खंभा परिसर के स्तंभ पर उकेरी गई भगवान श्री गणेश की प्राचीन विरूपित आकृति। यद्यपि मध्यकाल में इस पर प्रहार कर इसे खंडित करने का प्रयास किया गया, परंतु विग्रह का स्वरूप आज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो इस परिसर के मूलतः एक हिंदू मंदिर होने का अकाट्य पुरातात्विक साक्ष्य है। (चित्र सौजन्य: YSCRI)


मुस्लिम आक्रमण के दौरान इन स्तंभों पर उकेरी गई सनातन देवी-देवताओं की मूर्तियों को क्रूरतापूर्वक खंडित (मूर्तिकला विरूपण) किया गया था। पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान इन स्तंभों पर खंडित अवस्था में भी निम्नलिखित आकृतियों की स्पष्ट पहचान की गई है:

  • माता काली, भगवान श्री गणेश, चार गदाओं को धारण किए हुए भगवान विष्णु और भगवान नरसिंह।

  • इसके अतिरिक्त, स्तंभों पर भारतीय संस्कृति के शुभ प्रतीक जैसे मोर, मगरमच्छ, गोलाकार चक्रनुमा आकृतियां और पुष्प उकेरे गए हैं।

  • स्तंभों के कोनों पर विशेष रूप से दोहरी सर्पनुमा पूंछ वाले नाग विराजमान हैं, जिनकी पूंछ आपस में अत्यंत कलात्मक ढंग से लिपटी हुई दिखाई देती है। साथ ही, कुछ स्थानों पर बड़ी और घूरती हुई आंखों वाले विकृत चेहरे (कीर्तिमुख या भारवाहक यक्ष) भी दिखाई देते हैं, जिनसे छोटे हाथ-पैर जुड़े हैं परंतु शरीर का कोई अवशेष नहीं है।

इल्तुतमिश का अरबी शिलालेख: आक्रमण का ऐतिहासिक साक्ष्य

इस प्राचीन मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर अरबी भाषा का एक शिलालेख खुदा हुआ है। यह शिलालेख द्वार के दाहिनी ओर जमीन से शुरू होकर, दरवाजे के शीर्ष (ऊपर) से गुजरता हुआ बाईं ओर जमीन पर समाप्त होता है।

वर्तमान में यह शिलालेख काफी क्षतिग्रस्त (Effaced) हो चुका है, परंतु इसका जो भाग पठनीय है, वह इस प्रकार है:

"दीन उल सुल्तान उल आलम उल आदिल उल असाम उल मुल्क अबुल मुसफ्फर इल्तितमिश उल सुल्तान"

यह शिलालेख स्पष्ट रूप से दिल्ली सल्तनत के सुल्तान शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (शासनकाल: 1211–1236 ईस्वी) का है, जो कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम और दामाद था। ऐबक की मृत्यु के बाद उसने दिल्ली की सत्ता पर अधिकार किया था। यह शिलालेख प्रमाणित करता है कि इल्तुतमिश के काल में इस क्षेत्र पर मुस्लिम आक्रमण हुआ और इस प्राचीन मंदिर को मस्जिद का रूप देने का प्रयास किया गया।

शूरसेन राजवंश का शिलालेख और बयाना के जादौनों से संबंध

इस मंदिर परिसर के पुरातात्विक अन्वेषण में 'शूरसेन वंश' का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राचीन शिलालेख भी प्राप्त हुआ है। इस शिलालेख की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:

  • इसमें शूरसेन वंश के सात क्रमिक राजाओं का ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है।

  • शिलालेख में इसी राजवंश की रानी वच्छलिका द्वारा एक भव्य विष्णु मंदिर के निर्माण कराए जाने का स्पष्ट वर्णन है।

  • ऐतिहासिक अनुसंधान का निष्कर्ष: इस शिलालेख में वर्णित किसी भी शूरसेन राजा का नाम बयाना के प्रसिद्ध यदुवंशी जादौन (यादव) राजाओं की वंशावली से मेल नहीं खाता है। इतिहासविदों और पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार, यह पूरी तरह से प्रतीत होता है कि यहाँ उल्लिखित राजवंश वास्तव में मथुरा के शूरसेन (सूरसेन) राजाओं की ही एक स्थानीय शाखा थी, जिसने इस क्षेत्र पर शासन किया और इस कलात्मक विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया था।

निष्कर्ष

कामवन (कांमा) का यह ८४/चौसठ खंभा परिसर केवल एक पुरातात्विक ढांचा नहीं है, बल्कि यह भारत के समृद्ध सनातन इतिहास, कलात्मक चरमोत्कर्ष और मध्यकाल में हुए सांस्कृतिक आघातों का एक जीता-जागता गवाह है। प्राथमिक ऐतिहासिक स्रोतों (कनिंघम रिपोर्ट और ब्रिटिश गजेटियर) पर आधारित यह शोध आलेख स्पष्ट करता है कि ब्रजभूमि का यह क्षेत्र शूरसेन राजाओं के काल में वैष्णव संस्कृति का एक महान केंद्र था।

अनुसंधान प्रदाता: योगेश्वर श्रीकृष्ण सांस्कृतिक अनुसंधान संस्थान (YSCRI)

ऐतिहासिक संदर्भ: ब्रिटिश गजेटियर (1905) एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) रिपोर्ट (1882-83)






Thursday, May 28, 2026

Jihad Or Holy War : A necessary concept to be understood by every Indian.

HISTORY OF THE MUSLIM WORLD

 

भारत में जब हम पश्चिमी तरफ के मुस्लिम आक्रमणों के इतिहाकर को पढ़ते है तो अक्सर भारतीय राजाओं के विरूद्ध  जिहाद और Holy War जैसे शब्द मिलते है। जिहाद और Holy War का उल्लेख महमूद गजनवी से लेकर बाबर तक के विवरण में मिलता है।


वर्ष 1930 ई० में Khan Bahadur Ahsanullah द्वारा लिखित पुस्तक HISTORY OF THE MUSLIM WORLD में Jihad Or Holy War का उल्लेख है।


खान बहादुर साहब Jihad Or Holy War के उल्लेख में लिखते है कि जीते हुए इलाकों के लोगों को हमेशा सबसे पहले खलीफ़ा इस्लाम कबूल करने के लिए कहता था। अगर वे एतराज़ करते तो उन्हें खलीफ़ा की हुकूमत माननी पड़ती और अपनी बात मानने के लिए जजिया या कैपिटेशन-टैक्स देना पड़ता था। लेकिन जजिया देने से मना करने पर किसी की जान या माल की ज़ब्ती नहीं होती थी। जिहाद या पवित्र युद्ध उन लोगों के खिलाफ़ घोषित किया जाता था जो इस्लाम कबूल करने से मना करते थे और लड़ाई की पेशकश करते थे। जीते हुए लोगों से लूटे गए माल का, पाँच में से चार हिस्सा जीतने वाली सेना का होता था। जो लोग इस्लाम कबूल कर लेते थे, वे इस्लामी समुदाय में शामिल हो जाते थे और उसके खास अधिकार पाने के हकदार होते थे।


भारत के हिन्दू राजाओं के विरुद्ध अनेक मुस्लिम इतिहासकारों ने आक्रमणकारियों के ऐतिहासिक वृतांतों में जिहाद या पवित्र युद्ध का उल्लेख किया है।


इन युद्धों के बाद मंदिरों को तोड़ने, हिन्दू नरसंहार,जजिया, धर्मांतरण जैसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है।


भारतीयों को इतिहास में घटी घटनाओं की सही जानकारी होनी चाहिए, ताकि भविष्य में इतिहास को ध्यान में रखकर सही निर्णय ले सकें और भारत की एकता व अखंडता चिरकाल तक सुनिश्चित की जा सकें।


वर्ष 1947 ई० का भारत विभाजन हर भारतीय के सीने पर एक घाव है।

Wednesday, May 27, 2026

जौनपुर का रतागढ़ या जाफराबाद और महाराज जयचन्द्र का किला।

 

Symbolic Picture of the Jaychandra Fort with ASI record. 


उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में जौनपुर शहर के निकट स्थित जाफराबाद अपने आप में इतिहास व उसके विध्वंस की कहानी समेटे है।


गोमती नदी के किनारे स्थित जाफराबाद मूल रूप से एक सनातन सभ्यता का केंद्र है।


ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार कन्नौज के राष्ट्रकूट (राठौड़/गहरवार) राजाओं के अधीन जाफराबाद का मूल नाम रतागढ़ (Ratagarh) मिलता है।


यहाँ पर महाराज विजयचंद्र, महाराज जयचंद्र व उनके पुत्रों द्वारा शासन का उल्लेख मिलता है।


वर्ष 1908 ई० के जौनपुर गजेटियर इसका एक पुराना नाम मनाइच (Manaichh) का उल्लेख है।


वही वर्ष 1889 ई० की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की रिपोर्ट  ARCHAEOLOGICAL  SURVEY OF INDIA, NEW SERIES, VOLUME 1, NORTH-WESTERN PROVINCES AND OUDH: JAUNPUR, &c.  में जाफराबाद के पुराने नाम रतागढ़ (Ratagarh) का उल्लेख है।


वर्ष 1908 ई० के जौनपुर गजेटियर में लिखा है कि महमूद गजनी ने बनारस के चंद्रपाल से यह रतागढ़ को जीता था जोकि बाद में कन्नौज के राष्ट्रकूट राजाओं के अधीन आ गया। मोहम्मद गौरी ने महाराज जयचंद्र राठौड़ के पुत्रों से रतागढ़ जीता जोकि बाद पुनः गहरवारों के अधीन आ गया।


मोहम्मद तुगलक के तीसरे पुत्र जफर खान व रतागढ़ के सकत सिंह के बीच हुए युद्ध में, सकत सिंह की वीरगति के पश्चात जफर खान ने रतागढ़ का नाम जाफराबाद कर दिया।


रतागढ़ (वर्तमान जाफराबाद) में सहन-ए-शहीदान या शहीदों का मैदान स्थान है यह विभिन्न मुस्लिम आक्रमणों में मारे गए लोगों का कब्रिस्तान है।


रतागढ़ का किला करीब 18 एकड़ में फैला है। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन एक संरक्षित स्मारक है।


भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन रतागढ़ The walls of the Kankar-fort of Jaychandra नाम से वर्ष 1920 ई० से वर्तमान समय तक संरक्षित है।



18 एकड़ में फैला रतागढ़ किला दीवारों से घिरा है जिसकी कुछ दीवारों की ऊंचाई 25-50 फ़ीट तक है। इस किले की सतह से नीचे खुदाई करने पर कई फ़ीट गहराई में बड़ी बड़ी ईंटे मिलती है।


इसकी शैली हिन्दू शैली है, यह महल कन्नौज के राजाओं का महल हुआ करता था, यहाँ पर गुप्त कालीन सोने के सिक्के भी प्राप्त हुए है।


वहीं मुस्लिम अभिलेखों में इसका नाम असनी मिलता है। यह पूरा इलाका टीलों से भरा पड़ा था जोकि हिन्दू महलों और मंदिरों को दर्शाते थे।


यहाँ पर शेख बरन की मस्जिद स्थित है जिसके स्तंभ हिन्दू शैली के है। इसकी छत समतल है इसके हॉल की ऊँचाई 18 फ़ीट है जिसमें पूर्व से पश्चिम तक नौ व उत्तर से दक्षिण तक सात खंड है। स्तंभों की बाहरी पंक्तियां दोहरी है और सबसे बाहरी स्तम्भों की बीच की जगह को सदी दीवारों से भरा गया है। इसमें कुल 56 स्तम्भ है जोकि वर्गाकार है जोकि स्पष्ट रूप से हिन्दू मूल के है।


यह स्तम्भ कन्नौज के राजा विजयचंद्र द्वारा बनाये गए मन्दिर के भाग है इस मंदिर के भवन का मस्जिद के रूप में उपयोग जफर खान द्वारा शुरू किया गया।


यहाँ पर मौलाना बहराम व शेख बरन की कब्रें है, मौलाना बहराम को जफर खान द्वारा मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए नियुक्त किया गया था, शेख बरन , मौलाना बहराम के ही वंशज थे।


मुस्लिम शासन आने के बाद यहाँ मुस्लिम शासन का प्रभाव दिखता है जिसके मूल में आज भी हिंदू शैली के भवन व इतिहास दिखता है।

Monday, May 18, 2026

सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने युद्धक्षेत्र में वीरगति प्राप्त की थी।

History of India by M. Elphinstone


 वर्ष 1843 ई० में प्रकाशित अंग्रेज अधिकारी माउंटस्टुअर्ट एलफिंस्टन ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ इंडिया में सम्राट पृथ्वीराज चौहान व मोहम्मद गौरी के तराइन के दूसरे युद्ध के बारे में लिखा है।


सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को आगे न बढ़ने के लिए संदेश भेजा जिस गौरी के जनरल ने आदेश के लिए समय मांगा।



सम्राट पृथ्वीराज चौहान व मोहम्मद गौरी की सेनाओं के कैम्प पास-पास थे बीच में एक नाला था।


मोहम्मद गौरी ने भोर होते ही बीच के नाले को पार कर सम्राट पृथ्वीराज चौहान की सेना के कैम्प पर हमला कर दिया जिससे अफरा-तफरी मच गई। 


अपनी योजना में विफल होने के बाद गौरी भागने लगा जिसका पीछा सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने किया।


 सेना से दूर होते ही गौरी के पहले से तैयार 12000 सैनिकों ने महाराज पृथ्वीराज चौहान और उनके सरदारों को घेर लिया, महाराज पृथ्वीराज चौहान और उनके सरदारों को युद्ध क्षेत्र में ही मार दिया।


सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने युद्ध क्षेत्र में ही वीरगति प्राप्त की थी उन्हें न तो गजनी ले जाया गया और न ही उन्हें अंधा किया गया।


1206 ई० में खोखर राजपूतों ने गौरी की हत्या कर दी।


जिस समय गौरी ने हमला किया वह युद्ध विराम का समय था, गौरी यह जानता था कि वो कभी नियमों से युद्ध नहीं जीत सकता।


इतिहास में सच लिखा है लेकिन क्षत्रियों को अपमानित करने के लिए झूठ प्रचारित किया जाता है।

Thursday, April 30, 2026

हसन खान मेवाती के बारे में बाबर का उल्लेख।

(Source- The Baburnama in English, Translated by A.S. Beveridge)




बाबरनामा के पेज संख्या- 545 पर बाबर ने लिखा है कि इब्राहीम के साथ लड़ाई में हसन खान मेवाती का बेटा नाहर खान हमारे हाथ लग गया था; हमने उसे बंधक बना लिया था और दिखावे के तौर पर उसी के कारण उसका पिता (हसन खान मेवाती) लगातार हमारे पास आता-जाता रहता था और उसे बुलाता रहता था। अब कई लोगों को लगा कि अगर हसन खान को उसके बेटे को भेजकर मना लिया जाए, तो वह ज़्यादा नरम दिल हो जाएगा और मुझसे मिलने के लिए उसका आना-जाना आसान हो जाएगा। इसलिए नाहर खान को सम्मान का वस्त्र पहनाया गया; उसके पिता के लिए उससे वादे किए गए और उसे जाने की इजाज़त दे दी गई। वह पाखंडी [हसन खान] ज़रूर अपने बेटे को मुझसे जाने की इजाज़त मिलने का इंतज़ार कर रहा था, क्योंकि यह सुनकर और जब उसका बेटा अभी तक उससे नहीं मिला था, वह अलवर से निकलकर तुरंत आगरा ज़िले के तोडा भीम में राणा सांगा से जा मिला। उस समय उसके बेटे को जाने देना एक गलत निर्णय रहा।


बाबर के इस उल्लेख से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हसन खान मेवाती इब्राहीम लोदी के साथ पानीपत की लड़ाई में बाबर के विरुद्ध लड़े जिसकारण हसन खान मेवाती के बेटे हसन खान को बाबर ने युद्ध बंधक बना लिया, इब्राहीम के बाद उन्होंने राणा सांगा के साथ बाबर के विरुद्ध युद्ध करना जारी रखा।


बाबर के इस उल्लेख से बाबर के विरुद्ध हसन खान मेवाती द्वारा राणा सांगा की सेना से मिलना एक राजनीतिक कारण को दर्शाता है।


एक साधारण सी बात है दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है यहाँ पर राणा सांगा और अफगानों दोनों का दुश्मन एक था बाबर।


आजकल के इतिहासकार राणा सांगा की छवि नकारात्मक और हसन खान मेवाती की छवि एक राष्ट्रवादी के रूप में दिखाते है लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों के विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल एक राजनीतिक मजबूरी थी क्योंकि हसन खान मेवाती इब्राहीम लोदी के साथ थे और इब्राहीम लोदी को राणा सांगा पहले ही खतौली के युद्ध में हरा चुके थे।



Wednesday, February 25, 2026

पिछले 2100 वर्षो से भारत की राजनीतिक अस्थिरता का कारण पुष्यमित्र शुंग।

Megasthenese in Chandragupta's Court



सेल्युकस निकेटर अलेक्जेंडर जिसे सिकदंर भी कहते है का सेनापति व उत्तराधिकारी था। सेल्युकस निकेटर महान सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के समकालीन था।

सेल्युकस निकेटर का राजदूत मेगस्थनीज था जिसने अपनी पुस्तक इंडिका लिखी। मेगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में पाटलिपुत्र (पटना) आया था, उसने भारत व भारतीय समाज का विवरण अपनी पुस्तक इंडिका में लिखा है।

इंडिका में मेगस्थनीज ने एक बहुत महत्वपूर्ण बात लिखी है कि भारत पर कभी किसी विदेशी ने हमला नहीं किया और न ही भारत ने कभी किसी विदेशी राष्ट्र पर हमला किया। 

मेगस्थनीज के इस विवरण से चन्द्रगुप्त मौर्य के काल तक यह बात स्पष्ट हो जाती है कि चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल और शासन काल से पहले न तो भारत पर किसी विदेशी राष्ट्र ने आक्रमण किया और न ही भारत ने किसी विदेशी राष्ट्र पर आक्रमण किया।

चन्द्रगुप्त मौर्य के बाद बिन्दुसार, अशोक से लेकर अंतिम मौर्य राजा बृहदरथ मौर्य तक के शासनकाल का ऐतिहासिक विश्लेषण करने पर यही मिलता है कि भारत पर किसी विदेशी राष्ट्र ने आक्रमण किया और न ही भारत ने किसी विदेशी राष्ट्र पर आक्रमण किया, दूसरे शब्दों में भारत राजनीतिक रूप से स्थिर था। 

वर्ष 1897-98 ई० के पेशावर जिले के गजेटियर के पेज संख्या - 45 पर पेशावर के इतिहास के विवरण में चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक का उल्लेख है और बौद्ध धर्म के विस्तार व विकास का उल्लेख है। इसी पेज पर लिखा है कि 241 ईसा पूर्व बौद्ध धर्म के प्रचारक मज्झंतिको के पेशावर भेजा गया जिन्होने कई पुजारियों को दीक्षा दी। अंतिम राजवंश को पुष्यमित्र शुंग ने उखाड फेंका जिसे ब्राह्नाण पुजारियों ने बौद्धों के नरसंहार के लिए उकसाया था। इसी समय 165 ईसा पूर्व बैक्ट्रिया के राजा मेनेंडर के नेतृत्व में ग्रीकों ने सिंधु घाटी पर हमला किया और 149 ईसा पूर्व मेनेंडर के उत्तराधिकारी एनक्रैटिडीज ने काबुल और पेशावर को अपने राज्य में मिला लिया इसके बाद शक, कुषाणों ने भारत पर आक्रमण किया।

Gazetteer of the PESHAWAR District 1997-98, Page No.- 45



ऐतिहासिक दस्तावेजों से यह पता चलता है कि पुष्यमित्र शुंग मौर्य राजा बृहदरथ मौर्य का सेनापति था जिसने बृहदरथ मौर्य की हत्या कर मौर्य वंश के शासन का अंत किया था। 

ऐतिहासिक दस्तावेजों के विश्लेषण से पता चलता है कि बृहदरथ मौर्य की हत्या के बाद ग्रीक, शक, कुषाण, हूणों का आक्रमण भारत पर हुआ और इस्लाम के उदय के बाद 7 वीं शताब्दी से ही भारत ने लगातार इस्लामिक आक्रमणों के झेलना शुरू किया। शक, कुषाण, हूण और इस्लामिक आक्रमणकारियों से भारतीय राजा लगातार लडते रहे और आज भारतीय सभ्यता और संस्कृति एक खंडित अवस्था मे हम सभी के सामने है। 

शुंग वंश का शासनकाल अधिक समय तक नहीं रहा, लेकिन पुष्यमित्र शुंग के इस कृत्य से भारत राजनीतिक अस्थिरता के काल के गर्त में अनिश्चितकालीन रूप से चला गया जो अब तक जारी है।     


Friday, January 2, 2026

मुस्लिम अभिलेखों में आगरा की प्राचीनता और हिंदू सभ्यता का उल्लेख है।

Translation of TARIKH-E-DAUDI



सिकंदर लोदी का दरबारी इतिहासकार अब्दुल्ला अपनी पुस्तक तारीखे-दाऊदी में आगरा के बारे में लिखता है कि 


हिंदू धर्म के लोग मानते हैं कि मथुरा में शासन करने वाले राजा कंस के समय में आगरा एक शक्तिशाली शहर था। राजा कंस अपने विरोधियों को किले में कैद कर लेता था, जिसके कारण समय के साथ-साथ वह किला राज्य का एक प्रमुख कारागार बन गया था।


आज भी आगरा के गोकुलपुरा में कंस गेट है जोकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन एक संरक्षित स्मारक है।


अब्दुल्ला ने अपनी पुस्तक में आगरा में किले का उल्लेख किया है और वर्णन द्वापर युग का है।


जो भी कहते है कि आगरा के भवन मुगल शिल्पकला के अनुपम उदाहरण है लेकिन मुस्लिम अभिलेखों में आगरा के सम्बंध में  राजा कंस उल्लेख है और आगरा राजा कंस  का केंद्रीय कारागार था।


मुस्लिम इतिहासकार आगरा की प्राचीनता और हिन्दू सभ्यता का उल्लेख करते है आजकल के कुकुरमुत्ते आगरा को मुगल शिल्पकला का अनुपम उदाहरण बोलते है।


द्वापर युग में न बाबर का जन्म हुआ था न गौरी-खिलजी का और न उनके धर्म का।


आगरा एक प्राचीन हिन्दू नगर है।

Thursday, January 1, 2026

आगरा के अछनेरा को राजा अछल तोमर ने बसाया था।

Archaeological Survey of India, Report of A Tour in Eastern Rajputana, Year 1871-72-73 A.D.



आगरा के अछनेरा को राजा अछल तोमर ने बसाया था। आगरा की किरावली तहसील में एक शहर है अछनेरा, अछनेरा एक ब्लॉक है। अछनेरा एक ऐतिहासिक नगर है जिसका उल्लेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारी A.C.L. Carlleyele ने वर्ष 1871-72-73 ई० की अपनी रिपोर्ट Archaeological Survey of India, Report of A Tour in Eastern Rajputana में किया है। A.C.L. Carlleyle ने अपनी रिपोर्ट में अछनेरा का उल्लेख करते हुए लिखा है कि दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर के बेटे अछल राजा ने वर्ष 1051 ई० में अछनेरा को बसाया था। नेरे का अर्थ आश्रय होता है जिसका अपभ्रंश नेरा है। राजा अछल तोमर के नाम पर इसका नाम अछनेरा पड़ा। A.C.L. Carlleyle ने लिखा ही कि अछनेरा किला पत्थर से बना एक मध्यकालीन संरचना है जिसको Dismantled कर दिया गया है। यह किला ठाकुरों/राजपूतों का निवास स्थान था।

Monday, September 1, 2025

दाहिर ने हिन्द के राजाओं के विरुद्ध अरबों की सहायता ली थी।

Source- JRASB, 1841



वर्ष 1841 ई० की एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की रिपोर्ट के अनुसार सिंध का राजा चाच था। चाच के दो बेटे थे दाहिर और दिहिर। 

दाहिर सिंध का राजा था और दिहिर बुरहमानाबाद का गवर्नर था। दिहिर एक पारिवारिक समस्या के कारण दाहिर से नाराज हो गया और अपने बड़े भाई दाहिर को सजा देने की सोची। माँ के समझाने पर दिहिर मान गया।

कुछ समय बाद चेचक से दिहिर की मृत्यु हो गयी।

एशियाटिक सोसाइटी की रिपोर्ट के अनुसार दाहिर के राज्य के विकास को देखकर हिन्द के राजाओं ने कन्नौज के गवर्नर रणमल को दाहिर से युद्ध करने के लिए उकसाया।

हिन्द के राजाओं द्वारा दाहिर पर आक्रमण करने की खबर दाहिर पता चल गई। हिन्द के राजाओं ने दाहिर से युद्ध के लिए युद्ध क्षेत्र में डेरा डाल दिया।

दाहिर ने हिन्द के राजाओं के विरुद्ध युद्ध के लिए अरबों से सहायता माँगी और मोहम्मद उलाफी के नेतृत्व में भाड़े के 5000 सैनिक  बुलवाए।

दाहिर की सेना और अरब मोहम्मद उलाफी की सेना ने रात में हिन्द के राजाओं के कैम्प पर सोते हुए हमला कर दिया और राजा, सेनापतियों की हत्या कर दी और करीब 80,000 सैनिकों को बंदी बनाया।

इस घटना के बाद दाहिर ने 25 वर्षों तक सिंध पर राज किया

Saturday, August 30, 2025

भगवान बुद्ध का जन्म इक्ष्वाकुवंशीय सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल में हुआ था।

Source- JRASB,1832 & The Life of Buddha, 1931


वर्ष 1832 ई० एशियाटिक सोसाइटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, तिब्बती ग्रंथ डुल-वा-झुंग-ला-मा (Dul-va-zhung-la-ma)  में भगवान बुद्ध को अयोध्या के राजा इक्ष्वाकु का वंशज बताया गया है,  डुल-वा-झुंग-ला-मा को संस्कृत में विनय उत्तर ग्रंथ कहते है।

वर्ष 1931 ई० में Edward J Thomas ने अपनी पुस्तक The Life of Buddha as Legend and History में भगवान बुद्ध को विशुद्ध क्षत्रिय कुल का बताया गया है।

वर्ष 1832 ई० एशियाटिक सोसाइटी की रिपोर्ट में भी भगवान बुद्ध को सूर्यवंशी कुल के राजा इक्ष्वाकु का वंशज बताया गया है।

भगवान बुद्ध की पूजा श्रीहरि विष्णु ने नवें अवतार के रूप में होती थी, इस विषय पर शीघ्र ही तथ्यों के साथ नया लेख प्रकाशित किया जाएगा।

Thursday, August 28, 2025

भगवान बुद्ध राजा इच्छवाकु के वंशज थे।


Source- JRASB, 1832


वर्ष 1832 ई० एशियाटिक सोसाइटी की एक रिपोर्ट के अनुसार, तिब्बती ग्रंथ डुल-वा-झुंग-ला-मा (Dul-va-zhung-la-ma) जिसे संस्कृत में विनय उत्तर ग्रंथ कहते है। 


इस तिब्बती ग्रन्थ में शाक्य (गौतम बुद्ध) का उल्लेख है। इस ग्रंथ में गौतम बुद्ध को शाक्य कहा गया है।


इस ग्रंथ में शाक्य अर्थात भगवान बुद्ध को कौशल का निवासी बताया गया है, कौशल देश की सीमा कैलाश पर्वत तक फैली थी।


इसी ग्रंथ में शाक्य अर्थात गौतम बुद्ध या भगवान बुद्ध को राजा इच्छवाकु के वंशज बताया गया है, जिनका जन्म कपिलवस्तु में हुआ था।


वर्तमान में राजा इच्छवाकु के वंशज सूर्यवंशी क्षत्रिय है। राजा इच्छवाकु ही जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ है जिन्हें ऋषभनाथ भी कहा जाता है।


Friday, August 15, 2025

बदायूँ का नीलकंठ महादेव मंदिर या जामा मस्जिद।


Source- The Jami Masjid at Badaun and Other Buildings in UP



बदायूँ उत्तर प्रदेश का जिला व शहर है।

 बदायूँ एक प्राचीन स्थान है यह पांडवों से पहले राजा भरत के समय भी अस्तित्व में था।

वर्ष 1907 ई० के बदायूँ गजेटियर के अनुसार बदायूँ का पुराना नाम बुद्धगाँव, बुद्धमउ, वेदामऊ है।

वर्ष 1879 ई० के स्टेटिकल, डिस्क्रप्टिव एंड हिस्टोरिकल एकाउंट ऑफ नार्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेस, बदायूँ डिस्ट्रिक्ट की अनुसार बदायूँ के बारे में मौलवी मोहम्मद करीम के अनुसार बदायूँ व बदायूँ किले की स्थापना वर्ष 905 ई० में राजा बुद्ध ने की थी। 

वर्ष 1028 ई० में महमूद गजनवी के भतीजे सालार मसूद गाज़ी ने बदायूँ पर आक्रमण किया और युद्ध में सालार मसूद गाज़ी अध्यापक मीरन मल्हन व सेनापति बुरहान कातिल मारे गए जिनके मकबरे बदायूँ में स्थित है।

वर्ष 1175 ई० में बदायूँ में राजा अजयपाल का शासन था। वर्ष 1196 ई० में कुतुबुद्दीन ऐबक ने बदायूँ पर आक्रमण किया।

अगस्त 1887 ई० को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारियों को बदायूँ किले के दक्षिणी दरवाजे के पास से लखनपाल का शिलालेख मिला।

यह शिलालेख 3 फ़ीट चौड़ा व 1.6 फ़ीट ऊँचा है।

इस शिलालेख में शिव के सम्मान में श्लोक लिखे गए है। इस शिलालेख की भाषा संस्कृत है व लिपि 12वीं-13वीं सदी की देवनागरी है।

लखनपाल का यह शिलालेख 23  पंक्तियों का है जिससे कन्नौज के राष्ट्रकूट वंश की जानकारी मिलती है।  प्रथम पंक्ति से सातवीं पंक्ति के वर्णन को एक सारणी में लिखा जाय तो कन्नौज के राष्ट्रकूट वंश की वंशावली बनती है। 

इस वंशावली के अनुसार चन्द्र के पुत्र विग्रहपाल हुए, विग्रहपाल के भुवनपाल, भुवनपाल के गोपालदेव, गोपालदेव के तीन पुत्र हुए त्रिभुवन व मदनपाल व देवपाल, देवपाल के पुत्र भीमपाल हुए, भीमपाल के सुरपाल, सुरपाल के दो बेटे थे अमृतपाल व लखनपाल। 

यह शिलालेख लखनपाल का है जिनकी वंशावली कन्नौज के राष्ट्रकूट वंश से जुड़ती है। महाराज जयचंद्रदेव के समय लखनपाल बदायूँ के गवर्नर थे, लखनपाल का उल्लेख आल्हा-ऊदल के साथ आता है।

लखनपाल ने बदायूँ में नीलकंठ महादेव के मन्दिर का निर्माण किया, हालाँकि नीलकंठ महादेव मंदिर का उल्लेख राजा बुद्ध व अजयपाल के विवरण में आता है जिससे साबित होता है कि नीलकंठ महादेव मंदिर बहुत प्राचीन है जिसकी देखरेख व विकास लखनपाल ने किया।

वर्ष 1202-1209 ई० के बीच शमशुद्दीन अल्तमश बदायूँ गवर्नर था, जिसने नीलकंठ महादेव मंदिर को तोड़ा और मन्दिर के अवशेषों का उपयोग मस्जिद बनाने में किया, दूसरे शब्दों में कहा जाए तो मन्दिर को मस्जिद में परिवर्तित किया।

नीलकंठ महादेव मंदिर के खंभे, नक्काशीदार मूर्तियां, वास्तुशिल्प मस्जिद में देखी जा सकती है आजकल इस मस्जिद को जामा मस्जिद कहते है।

नीलकंठ महादेव मंदिर ( जामा मस्जिद) उत्तर से दक्षिण तक लगभग 280 फीट चौडा और पश्चिमी बाहरी दीवार के सामने से पूर्वी द्वार के सामने तक लगभग 226 फीट लंबी है। इस प्रकार आकार के मामले में यह जौनपुर की इमारतों को टक्कर देती है और भारत की सबसे बड़ी मुसलमान इमारतों में से एक है।

 योजना में यह एक अनियमित समांतर चतुर्भुज है, जो पूर्व की ओर सड़क के पास आते ही चौड़ा होता जाता है। आंतरिक प्रांगण पश्चिम में 176 फीट, पूर्व में 175 फीट, दक्षिण में 99 फीट 6 इंच और उत्तर में 98 फीट चौड़ा है; और केंद्र में लगभग 28 फीट वर्ग का एक टैंक है, जबकि उत्तर-पश्चिम में एक कुआं है। 

प्रांगण के पश्चिम की ओर नीलकंठ महादेव के शिवलिंग का प्रमुख स्थान है जिसे आजकल मुख्य मस्जिद कहते है, जो 75 फीट गहरा है और इमारत की पूरी चौड़ाई में फैली हुई है; यह तीन भागों में विभाजित है, केंद्रीय कक्ष 43 फीट 3 इंच वर्ग का है, जिसकी विशाल दीवारें 16 फीट मोटी हैं और एक बड़े गुंबद से छत बनी है। 

दोनों ओर एक लंबा गुंबददार कक्ष है, जिसका उत्तर में माप 78 फीट x 58 फीट और दक्षिण में 90 फीट x 58 फीट है। प्रत्येक कक्ष चूना पत्थर और ईंट से बने नौ से दस फीट की दूरी पर भारी खंभों द्वारा अनुदैर्ध्य रूप से पाँच खंडों और पार्श्व में चार खंडों में विभाजित है, जो एक बैरल छत को सहारा देते हैं।

 प्रत्येक छोर पर खिड़कियाँ हैं, और पश्चिमी दीवार में ऊपर छोटे-छोटे छिद्रों से भी प्रकाश प्रवेश करता है। केंद्रीय कक्ष आंतरिक रूप से 69 फीट ऊँचा है, लेकिन फर्श से 31 फीट की ऊँचाई पर यह अष्टकोणीय हो जाता है, जिसके किनारे मेहराबदार और धँसे हुए हैं। दीवारें पूर्व, उत्तर और दक्षिण में 18 फीट चौड़े मेहराबदार छिद्रों से छेदी गई हैं, और पश्चिम में एक गहरा मेहराब है, जिसके दोनों ओर दो छोटे नक्काशीदार स्तंभ हैं, जो स्पष्ट रूप से एक पुराने हिंदू मंदिर से लिए गए थे।

 पूर्वी मेहराब अब एक विशाल प्रोपिलॉन द्वारा दृष्टि से छिपा हुआ है, जो गुंबद को भी ढकता है। इसकी ऊँचाई लगभग 52 फीट 4 इंच और चौड़ाई 61 फीट 6 इंच है; बीच में 35 फीट 6 इंच ऊँचा एक बड़ा मेहराब है।

नीलकंठ महादेव मंदिर (कथित जामा मस्जिद) भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन एक संरक्षित स्मारक है।

ब्रिटिश सरकार व भारतीय राज्यों के संबंधों की श्रेणी।

Source- JASB, 1833



वर्ष 1833 ई० की एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल की रिपोर्ट के अनुसार अंग्रेजों ने भारत के क्षेत्रों को अपनी संधियों के अनुसार 6 भागों में विभाजित किया था।

प्रथम श्रेणी- प्रथम श्रेणी में वो राज्य आते थे जिनके भीतरी व आंतरिक मामलों में ब्रिटिश सरकार सीधे दखल देती थी। यह राज्य अपने क्षेत्र में आक्रमण व सुरक्षा के लिए अंग्रेजों से माँग कर सकते थे। प्रथम श्रेणी के राज्य थे-


1- ओडे, जिसका क्षेत्रफल 23,923 वर्ग मील था।


2- मैसूर, जिसका क्षेत्रफल 27,999 वर्ग मील था।


3- बेरार या नागपुर, जिसका क्षेत्रफल 56, 723 वर्ग मील था।


4- त्रावणकोर, जिसका क्षेत्रफल 4,574 वर्ग मील था।


5- कोचीन, जिसका क्षेत्रफल 1,988 वर्ग मील था।


दूसरी श्रेणी- दूसरी श्रेणी में वह राज्य आते थे जिनके आंतरिक मामलों में ब्रिटिश सरकार दखलंदाजी नहीं दे सकती थी किंतु अपने हितों के संबंध में दे सकती थी, यह राज्य भीतरी व बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा के लिए ब्रिटिश सरकार पर निर्भर थे। यह राज्य थे-


1-हैदराबाद, जिसका क्षेत्रफल 88, 884 वर्ग मील था।


2- बड़ोदा, जिसका क्षेत्रफल 24, 950 वर्ग मील था।

Source- JASB,1833


तृतीय श्रेणी- तृतीय श्रेणी में वह राज्य थे जोकि अपने राज्य में सुप्रीम थे जिनके किसी कार्य में ब्रिटिश सरकार की दखलंदाजी नहीं थी, ब्रिटिश सरकार ऐसे राज्यों के साथ एक सहायक के रूप में थी। यह राज्य थे-


1- इंदौर, जिसका क्षेत्रफल 4,245 वर्ग मील था।


2- उदयपुर, जिसका क्षेत्रफल 11,784 वर्ग मील था।


3- जयपुर, जिसका क्षेत्रफल 13, 427 वर्ग मील था।


4- जोधपुर, जिसका क्षेत्रफल 34, 132 वर्ग मील था।


5- कोटा, जिसका क्षेत्रफल 4, 389 वर्ग मील था।


6- बूंदी, जिसका क्षेत्रफल 2,291 वर्ग मील था।


7- अलवर, जिसका क्षेत्रफल 3,235 वर्ग मील था।


8- बीकानेर, जिसका क्षेत्रफल 18, 060 वर्ग मील था।


9-  जैसलमेर, जिसका क्षेत्रफल 9,779 वर्ग मील था।


10- किशनगढ़, जिसका क्षेत्रफल 724 वर्ग मील था।


11- बांसवाड़ा, जिसका क्षेत्रफल 1,449 वर्ग मील था।


12- प्रतापगढ़, जिसका क्षेत्रफ़ल 1,457 वर्ग मील था।


13- डूंगरपुर, जिसका क्षेत्रफ़ल 2,005 वर्ग मील था।


14- करौली, जिसका क्षेत्रफल 1,878 वर्ग मील था।


15- सिरोही, जिसका क्षेत्रफल 3,024 वर्ग मील था।


16- भरतपुर, जिसका क्षेत्रफल 1,946 वर्ग मील था।


17-  भोपाल, जिसका क्षेत्रफल 6,772 वर्ग मील था।


18- कच्छ, जिसका क्षेत्रफल 7,396 वर्ग मील था।


19- धार व देवास, जिसका क्षेत्रफल 1,466 वर्ग मील था।


20- धौलपुर, जिसका क्षेत्रफल 1,626 वर्ग मील था।


21- रीवा, जिसका क्षेत्रफल 10, 310 वर्ग मील था।


22- दतिया, झांसी, तेरही जिसका क्षेत्रफल 16, 173 वर्ग मील था।


23- सावंतवाड़ी, जिसका क्षेत्रफ़ल 935 वर्ग मील था।


चतुर्थ श्रेणी- चतुर्थ श्रेणी में वह राज्य था जोकि अपने क्षेत्र में सुप्रीम थे जिन्हें सुरक्षा की गारंटी थी वह राज्य थे-


1- अमीर खान- (टोंक,सिरोंज,निम्बाहरा) जिसका क्षेत्रफल 1,633 वर्ग मील था।


2- पटियाला, कैटल, नाबा, जींद जिसका क्षेत्रफल 16, 602 वर्गमील था।


पंचम श्रेणी- पंचम श्रेणी में वह राज्य था जिनसे मित्रता थी, वह राज्य थे-


1- ग्वालियर, जिसका क्षेत्रफल 32,944 वर्ग मील था।

Source- JASB, 1833


षष्ठम श्रेणी- षष्ठम श्रेणी में वह राज्य थे, जिसकी सुरक्षा और आंतरिक मामलों पर पूरा नियंत्रण ब्रिटिश सरकार का था। यह राज्य थे- 


1- सतारा, जिसका क्षेत्रफल 7,943 वर्ग मील था।


2- कोल्हापुर, जिसका क्षेत्रफल 3,184 वर्ग मील था।


इस क्षेत्रों में हैदराबाद, ओडे, भोपाल व टोंक मुस्लिम शासित राज्य थे। 


सतारा, ग्वालियर, नागपुर, इंदौर, बंडा, कोल्हापुर, धार व देवास मराठा राज्य थे।


उदयपुर, जयपुर, जोधपुर, बूंदी, कोटा, कच्छ, अलवर, बीकानेर, जैसलमेर, किशनगढ़, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, करौली, सिरोही, रीवा, दतिया, झांसी, तेरही राजपूत राज्य थे।


मैसूर, भरतपुर, त्रावणकोर, सावंतवाड़ी, कोचीन, धौलपुर अन्य हिन्दू जातियों द्वारा शासित राज्य थे।


छोटा नागपुर, सिरगुज़र, संभलपुर, सिंहभूम, उदीपुर, मणिपुर, तंजोर, फिरोजपुर, मरीच, संगाओं, नेपानी, अकुलकोटे, सागर,नर्बुड्डा, सिक्किम अन्य राज्य थे।


ब्रिटिश सरकार व भारतीय राज्यों के व्यापारिक, राजनीतिक संबधों व संधियों के संबंध में तत्कालीन परिस्थितियों पर एक व्यापक निष्पक्ष अन्वेषण आवश्यक है।